शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

(लघुकथा) कलाकारी



एक बहुत बड़े साहब थे. काम-धंधे वाले बड़े-बड़े लोग उनकी जी-हज़ूरी और कैश-सेवा में रहते थे. इसीलि‍ए तन्‍ख्‍वाह ज़्यादा न होने पर भी उनका रहन-सहन ठस्‍से का था. कभी-कभी कानून का चिंतन हो आता तो मनन करने लगते. एक दि‍न इसी मनन से प्रकाश प्रकट हुआ तो वे ख़ुद फ़ोटोग्राफ़र हो गए और उनकी घरघुस्‍सू बीवी पेंटर. अब दोनों ही, आए दि‍न प्रदर्शनि‍यां लगा-लगा कर फ़ोटुएं और पेंटिंग्‍स बेच नावॉं काट रहे हैं. दस-पंदह हज़ार रूपए की कीमत वाली एक कॉफ़ी टेबल बुक पर भी काम चल रहा है.

साहब का ड्राइवर भी पेपर-श्रैड्डिंग मशीन की एजेंसी लेने की सोच रहा है क्‍योंकि‍ लोग फ़ोटो और पेंटिंग्‍स ख़रीद कर, धीरे से उसे ही गि‍फ़्ट में दे जाते हैं.
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शनिवार, 23 जून 2012

(लघुकथा) पते का सबूत-1

(लघुकथा) पते का सबूत


 
वह देर रात बस से उतर, थका-हारा पैदल घर लौट रहा था. मोटर साइकि‍ल पर पेट्रोलिंग कर रहे दो पुलि‍सवालों ने उसे रोक कर पूछताछ की कि‍ वह कहॉं रहता है, कहॉं से आ रहा है और आई-कार्ड भी मॉंगा. उसने बताया कि‍ वह फलॉं ब्‍लाक में रहता है, काम से लौट रहा है. आई-कार्ड पर उसके घर का पता नहीं था और ड्राइविंग लाइसेंस पर पुराना पता था. पुलि‍सवालों को फ़ोटो भी उसकी शक्ल से मि‍लती नहीं लगी. अलबत्‍ता उन्‍होंने आई-कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस रख लि‍ए और कहा कि‍ पते का सबूत लेकर सुबह थाने आना.

गरीबी-रेखा से ऊपर होने के कारण राशन कार्ड वह बनवा नहीं सकता था. मकान और फ़ोन उसके अपने‍ नाम नहीं थे. मोबाइल प्रि‍पेड था. बि‍जली पानी का बि‍ल सोसायटी के नाम आता था. ऑनलाइन बैंकिंग के चलते पासबुक का ज़माना अब रहा नहीं. उसके वोटर आई कार्ड पर कि‍सी और की फ़ोटो छपी हुई थी. यू. आई. डी. कार्ड अभी बना नहीं था. चलते-चलते बहुत माथा पच्‍ची करने के बाद उसने फ़ैसला कि‍या कि‍ वह सुबह उस झुग्‍गि‍यों वाले बंगलादेशी से सलाह लेगा जो उनके यहां कारें साफ करने आता है. 
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