शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

टोपीगान
























ओ रे बाबा गॉंधी,
वो टोपी
जो तूने तो कम पहनी,
पर
हि‍न्‍दुस्‍तान को ज्‍यूँ गहना दी,
तेरे जाने के बाद
चपाटों ने
पूरे देश को पहना दी,

फि‍र न पूछ कि‍
तेरी इस टोपी से क्‍या क्‍या व्‍याभि‍चार हुआ.
रोज़ हुआ, हर बार हुआ.

अबके जो नए हल्‍लाबोली से आए हैं
इसे फि‍र संग लाए हैं.
घर से चले तो जेब में मोड़े हैं
मजमे में पहुँचे तो
कश्‍ती सी ओढ़े हैं,

ढर्रे की रवानी
ज़ि‍द सी ठानी,

ऐसे में,
जगजीत मुझे
न जाने क्‍यों
फि‍र तेरी याद सी हो आई कि‍
वो काग़ज़ की कश्‍ती
वो बारि‍श का पानी….
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

(लघुकथा) उड़ान




एक दि‍न, कभी न खुलने वाली एक खि‍ड़की के बाहर पक्षि‍यों का एक जोड़ा आ कर बैठा. ति‍नका ति‍नका ला कर एक घोंसला बनाया उन्‍होंने, फि‍र उसमें दो अंडे दि‍ए. दोनों बारी बारी से उन अंडों को सेते. एक दि‍न उन अंडों से दो छोटे-छोटे बहुत सुंदर जीवन नि‍कले. अब वे बारी बारी से उनके लि‍ए कुछ-कुछ ला कर खाने को देते. बच्‍चे तेज़ी से बढ़ने लगे. दोनों पक्षी मि‍ल कर उन्‍हें उड़ना सि‍खाते. बच्‍चे पंख फड़फड़ाते पर उड़ न पाते. लेकि‍न एक दि‍न, बच्‍चों ने अपने पंख तौले और उड़ान पर नि‍कल गए. फि‍र वे कभी नहीं लौटे. धीरे-धीरे घोंसले के ति‍नके बि‍खरने लगे...


खि‍ड़की के इधर, अरसे से ये सब देख रहीं बूढ़ी नम ऑंखों ने आज बड़ी लम्‍बी और गहरी सॉंस ली और फि‍र हौले से बंद हो गईं.
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बुधवार, 5 सितंबर 2012

(लघु कथा) जंगल





वह जंगल में कहीं खो गया था.
जंगल बहुत घना था और रात का अंधेरा घि‍रने को था, दि‍न का उजाला कम हो रहा था. उसे हर तरह के जंगली जानवरों का भी डर था. उसके पास अपना बचाव करने को कुछ नहीं था.

उसने तय कि‍या कि‍ उसे इन हालात से बच नि‍कलने के लि‍ए ठंडे दि‍माग़ से सोचना होगा. वह एक जगह बैठ गया और उसने फ़ैसला कि‍ उसके बचने का एक ही रास्‍ता है और वह है, कि‍सी भी एक दि‍शा में चल नि‍कलना...
तभी उसकी नींद खुल गई.

उसे लगा कि‍ उसके जीवन में भी यही एक ही रास्‍ता है.

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