रविवार, 10 नवंबर 2013

(लेख) कुत्‍ते



कुत्‍ते, बाहर से देखने में भले ही भॉंति‍ भॉंति‍ के लगते हों, पर अंदर से सब कुत्‍ते ही होते हैं. एक दम पक्‍के कुत्‍ते.  

कुत्‍तो को कुछ भी मि‍ल-बॉंट कर खाने की आदत नहीं होती. पेट कि‍तना भी भरा हो, मुँह ज़रूर मारते हैं. इसी तरह जहां मौक़ा देखा, टॉंग उठा देते हैं.
 
कुत्‍ते बहुत ढीठ होते हैं. उनकी ढि‍ठाई उनकी पूँछ से नि‍कलती है. न उनकी पूँछ सीधी होती है न ढि‍ठाई जाती है. इनकी पूँछ टॉगों के बीच तभी आती है जब इन्‍हें अपने से सवा-सेर मि‍लता है. इतना ही नहीं, सवासेर आगे तो इसे हि‍लाते भी सलीके से हैं. पट्टे की भी आदत होती है इन्हें, जहां कि‍सी ने टुकड़ा डाला उसी के हत्‍थे चढ़ जाते हैं. कुत्‍ते देश भर के हर क्षेत्र में पाए जाते हैं. सड़कों पर, मकानों में, मैदानों में, पि‍छवाड़ों में और भी न जाने कहां कहां. कुत्‍ते हर रंग, शक्ल और सूरत के होते हैं. काले कुत्‍तों के तो ठाठ भी अलग होते हैं क्‍योंकि‍ कुछ पंडि‍जी टाइप टोटकेबाज़, अपने-अपने यजमानों को बताते हैं कि‍ जाओ इनकी ख़ास आवभगत करो. यह इनके लि‍ए बोनस रहता है.

कुत्‍ते जब बात भी करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे भौंक रहे हों. कुत्‍ते बहुत कड़े जीव होते हैं, उन्‍हें कभी कि‍सी ने मुस्‍कुराते नहीं देखा होता इसीलि‍ए बात-बात पर भौंकने के साथ-साथ काटने भी दौड़ते हैं. कुत्‍ते कि‍सी को नहीं बख्‍़श्‍ते, सबको दौ़ड़ा लेते हैं और बहुत दूर तक छोड़ कर आते हैं. दूसरों के इलाक़े में नहीं जाते, बस अपनी ही गली में शेरपंती करते हैं.

कुत्‍ते ग़ज़ब के मतलबी होते हैं, उन्‍हें हड्डी डालो तो मुँह में दबा चलते बनते हैं. मि‍ल-बॉंट के खाने में वि‍श्‍वास नहीं रखते, दूसरे को भनक लग जाए तो गुर्रा कर बंदरों की तरह दॉंत दि‍खाते हैं. कि‍सी के पल्‍ले कुछ पड़े न पड़े, रात रात भर दूर-पार तक आसमान सि‍र पे भी उठाए रखते हैं.

(डि‍स्‍क्‍लेमर : कुत्‍तों को कि‍सी ज़िंदा या मृत व्‍यक्‍ति‍ के रूप में न देखा जाए)
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शनिवार, 2 नवंबर 2013

(लघुकथा) शहर


वे प्रकृति के चि‍तेरे रहे.‍ प्रकृति चित्रण करते करते सत्‍तर बसंत कब उन्‍हें लॉंघ गए पता ही न चला. मान-सम्‍मान-पुरस्‍कार सब कुछ मि‍ला उन्‍हें. अगली पीढ़ी ने चि‍त्रकला उनसे वि‍रासत में पाई. पुत्र भी जाना माना चि‍त्रकार है और पोता भी उन्‍हीं के पदचि‍न्‍हों पर चल नि‍कला. उन दोनों के चि‍त्रों में भी प्रकृति ही रंग भरती है.

उन्‍होंने प्रकृति‍ की गोद में बसे एक गांव में जब पहले-पहल ऑंखें खोलीं तो ऊपर बि‍छा असीम नीला आसमान पाया. बस वही उनमें बस गया. उनके हर चि‍त्र का नीला आकाश उनकी पहचान बन गया. एक दि‍न वे शहर आ बसे. बेटा यहीं पला बढ़ा. उसके चि‍त्रों में भी आसमान की छटा देखते ही बनती है. पर वह आसमान, नीला नहीं सलेटी रंगता है.

पर अब वे पोते के बने चि‍त्र देखते हैं तो कुछ दुखी दिखते हैं क्‍योंकि‍ वह आसमान को काले रंग में बनाने लगा है.
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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

(लघुकथा) बकरा





बहुत पुरानी बात है. कहीं दूर घने जंगल में एक मंदि‍र था. उस मंदि‍र में, लोग बकरों की बलि‍ देने के बजाय उन्‍हें यूं ही आवारा छोड़ जाते थे. ऐसे ही आवारा बकरों में से एक बकरा बहुत छंटा हुआ नि‍कला, वह बकरि‍यों के पीछे बोक्‍काया फि‍रता. उसने दूसरे बकरों को सींग मारे और अपनी प्रधानगी में बकरि‍यों की पंचायत बना ली.

बकरि‍यां आए दि‍न उसकी छत्रछाया तले मंदि‍र में अपनी आरती उतरवा आतीं. ज़िंदगी भर उसने एक से एक ज़बर बकरि‍यां देखीं. बकरि‍यों को सहलाते-सहलाते, बकरा पसरे हुए ही बुढ़ा गया. बुढ़ैती में भी, एक और छबीली बकरी उसके पीछे लगी रह कर आरती उतरवाती रही. पर एक दि‍न कुछ मेमनों को ये सब रास न आया और फट्टा हो ही गया. दुनि‍या-जहान ने खूब मिर्च-मसाला लगा कर पूरे जंगल में तरह-तरह की बातें उड़ा दीं. पर कि‍सी का कुछ न बि‍गड़ा. बात आई-गई हो गई. इधर मंदि‍रबाज़ी चालू रही. उधर, छबीली भी आगे नि‍कल गई, उसने दूसरा जंगल चुन लि‍या.

आज उन सबके अपने-अपने जंगल हैं और उनके भीतर अपने-अपने मंदि‍र.
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

सुबह होगी.



इन दरीचों से,
ठंडे झोंके सा चला आता है नख़लि‍स्‍तान ,
अफ़वाह तो महज मजहब के दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

चल आ बैठ,
फूंक दें रूस्‍वाइयां ज़माने भर की आज,
दामन में कांटों की बात (?) दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

आसां है बहुत
रोशनी को बुर्कों में दफ़न कर देना यार,
कंदील से घर जला देने की दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

चलो तो चलो
तूफ़ानों की तरह कि वो रूकते नहीं हमदम,
तूफ़ानों के ठहर जाने की दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.  

भरोसा तो रख,
गुजर जाएगा ये वक्‍त भी रात की तरह,
आफ़ताब ठहर जाने की भी दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

(लघुकथा) शतरंज



एक देश में एक अदालत थी और एक था चोट्टा.
उसी देश से, चोट्टे और अदालत का संवाद:-

अदालत तुम देश कैसे चला सकते हो ?
चोट्टा मैं क्‍या करूं, लोग मानते ही नहीं.
अदालत ठीक है, मैंने तुम्‍हें आज़ाद कि‍या.
चोट्टा रूको रूको मैं कानून बदल के लाता हूं.
अदालत लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में बदलाव नहीं चलेगा.
चोट्टा ठीक है संवि‍धान में ही बदलाव कर देता हूं.
अदालत वो तुम कर नहीं सकते, याद है न भारत का केशवानंद भारती केस ?

चोट्टे और अदालत का संवाद समाप्‍त हुआ.
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