बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

सुबह होगी.



इन दरीचों से,
ठंडे झोंके सा चला आता है नख़लि‍स्‍तान ,
अफ़वाह तो महज मजहब के दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

चल आ बैठ,
फूंक दें रूस्‍वाइयां ज़माने भर की आज,
दामन में कांटों की बात (?) दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

आसां है बहुत
रोशनी को बुर्कों में दफ़न कर देना यार,
कंदील से घर जला देने की दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

चलो तो चलो
तूफ़ानों की तरह कि वो रूकते नहीं हमदम,
तूफ़ानों के ठहर जाने की दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.  

भरोसा तो रख,
गुजर जाएगा ये वक्‍त भी रात की तरह,
आफ़ताब ठहर जाने की भी दुश्‍मन ने उड़ाई होगी.

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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

(लघुकथा) शतरंज



एक देश में एक अदालत थी और एक था चोट्टा.
उसी देश से, चोट्टे और अदालत का संवाद:-

अदालत तुम देश कैसे चला सकते हो ?
चोट्टा मैं क्‍या करूं, लोग मानते ही नहीं.
अदालत ठीक है, मैंने तुम्‍हें आज़ाद कि‍या.
चोट्टा रूको रूको मैं कानून बदल के लाता हूं.
अदालत लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में बदलाव नहीं चलेगा.
चोट्टा ठीक है संवि‍धान में ही बदलाव कर देता हूं.
अदालत वो तुम कर नहीं सकते, याद है न भारत का केशवानंद भारती केस ?

चोट्टे और अदालत का संवाद समाप्‍त हुआ.
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बुधवार, 18 सितंबर 2013

(लघुकथा) ज्योति‍ष


उसे ज्‍योति‍ष पर कोई वि‍श्‍वास न था. वह समाचार पत्र में साप्‍ताहि‍क भवि‍ष्‍यफल कभी-कभी पढ़ तो लेता था पर ठीक वैसे ही जैसे लोग चुककुले भी पढ़ लेते हैं. उसके एक मि‍त्र ने कहीं से ज्योति‍ष और हस्तरेखा का कोई कोर्स कर रखा था. वह अपने उन मि‍त्र को प्राय: कुछ-कुछ कटाक्क्षपूर्ण बातें भी कहता. वे मि‍त्र उसे समझाने के कोई वि‍शेष प्रयास न करते लेकि‍न कहते कि‍ यह एक वि‍ज्ञान है. एक दि‍न उसने कहा कि‍ चलो अगर ऐसी बात है तो मुझे भी समझाओ तो अपना ये वि‍ज्ञान.

उसके मि‍त्र ने ज्‍योति‍ष के बारे में उसे धीरे-धीरे पढ़ाना-बताना शुरू कि‍या. वह वि‍षय के बारे में कुछ-कुछ गंभीर होने लगा. कुछ करने-कराने से पहले शुभ-अशुभ घड़ी और दि‍न-वार-मुहूर्त देखने लगा. वास्‍तु और फेंग शुई की कि‍ताबें पढ़ कर घर में उथल-पुथल भी शुरू कर दी. उसे पता चला कि‍ रंगों का भी एक और वि‍ज्ञान है, तो उस पर भी चलना शुरू कर दि‍या.


तभी, एक दि‍न उसने अपनी पत्‍नी को कि‍सी से फ़ोन पर बात करते सुना –‘अरी शुकर मना कि‍ तेरे पति‍ के दोस्‍त तो बस जुआरी और शराबी-कबाबी ही हैं, मेरे इनका दोस्‍त तो कोई एक पागल है उसने पता नहीं इन पर कोई जादू-टोना कर दि‍या है या ये भी उसी की तरह गए काम से. कि‍सी साइकि‍यैट्रि‍स्‍ट के बारे में जानती हो तो बताओ...’
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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

(लघुकथा) ख़ूबसूरत


वह एक बहुत सुंदर युवक था. सुडौल सुघड़. कि‍न्‍तु भगवान का खेल देखि‍ए, अक़्ल से पैदल था वह. बातचीत में नि‍तांत सभ्‍य और जी हज़ूरी में एकदम पुख़्ता. क्‍या मज़ाल कि‍ वह कि‍सी को नाराज़ कर दे. मि‍ल-बैठने की कैसी भी बात हो, वह सबसे आगे मि‍लता. कुछ-कुछ ख़ास तरह के पीठ-खुजाउ माहौल में तो वह हमेशा हाज़ि‍र रहता. कुछ थे जो उसे पसंद नहीं करते थे पर न कुछ बोल सकते थे न कुछ कर सकते थे. सुंदरता से इठलाते, उसे शादी-ब्‍याह की याद तक न रही. जब समय नि‍कल गया तो अपने आप को समझाने लगा कि‍ शादी की ज़रूरत कि‍से है, शादी बंधन है, वि‍वाह से आज़ादी छि‍न जाती है, वि‍वाह के बाद की गुलामी कौन सहे ...

उम्र बढ़ने लगी, आसपास के लोग धीरे धीरे सि‍मटने लगे. 

एक दि‍न, मुंह उठा कर वह कहीं कि‍सी कार्यक्रम का दीवार पर चि‍पका पोस्‍टर देख रहा था कि‍ उसे, उसी के जैसी, वह अधेड़ औरत मि‍ली जो अपनी जवानी के दि‍नों में इसे दुत्‍कारने के काबि‍ल भी नही समझती थी. उस औरत ने पूछा –‘तो तुम भी आजकल नीचे उतर आए !’. वह खि‍सि‍या कर मुस्‍कुरा दि‍या. और दोनों, आगे बात कि‍ए बि‍ना फि‍र पोस्‍टर देखने में व्‍यस्‍त हो गए.
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