इन
दरीचों से,
ठंडे
झोंके सा चला आता है नख़लिस्तान ,
अफ़वाह
तो महज मजहब के दुश्मन ने उड़ाई होगी.
चल
आ बैठ,
फूंक
दें रूस्वाइयां ज़माने भर की आज,
दामन
में कांटों की बात (?) दुश्मन ने उड़ाई होगी.
आसां
है बहुत
रोशनी
को बुर्कों में दफ़न कर देना यार,
कंदील
से घर जला देने की दुश्मन ने उड़ाई होगी.
चलो
तो चलो
तूफ़ानों
की तरह कि वो रूकते नहीं हमदम,
तूफ़ानों
के ठहर जाने की दुश्मन ने उड़ाई होगी.
भरोसा
तो रख,
गुजर
जाएगा ये वक्त भी रात की तरह,
आफ़ताब
ठहर जाने की भी दुश्मन ने उड़ाई होगी.
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