जो मुझसे बड़े हैं
बैसाखी पे खड़े हैं.
देखो न आदमकद
दुगने तो गड़े हैं.
मेरी सुनेंगे क्या
वो तो खुद अड़े हैं.
हारने का ख़ौफ़ दो
उन्हें, जो न लड़े हैं.
पलटता नहीं हूं मैं
मेरे फ़ैसले कड़े हैं.
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वह गॉंव से शहर आ गया था
और कुछ ले-दे के रेलवे लाइन के किनारे बंग्लादेशियों के साथ-साथ उसने भी एक
झुग्गी डाल ली थी. गॉंव में उसके पास यूं भी कुछ नहीं था दूसरों के यहां किसानी-मज़दूरी
करता था, यहां चौकीदारी करने लगा. एक दिन वह दूसरे गार्ड से बात कर रहा था कि शहरों
में लोग जात-बिरादरी के हिसाब से नहीं रहते.
एक
दिन उनका, एक कलाकार मित्र के घर जाना हुआ. जैसे ही घर पहुंचे तो देखते क्या
हैं कि कमरे में ज़मीन पर एक छोटी सी एब्स्ट्रैक्ट पेंटिग रखी है. उसे देखते
ही उनके मुँह से निकला –‘वाह वाह वाह क्या बात है. जीवन, प्रकृति और ब्रह्माण्ड का ऐसा अद्भुत चित्रण मैंने पहले कभी नहीं देखा.
भगवान ने निश्चय ही तूलिका से ही ब्रह्माण्ड की रचना की
होगी, भगवान वैज्ञानिक नहीं कलाकार रहा होगा, पक्का. कोई एक ही रंग से भी ऐसी
कलाकृति बना कैसे सकता है, मैं तो सोच भी नहीं सकता. इसमें रंगों की छाया का
सांमजस्य अद्भुत है अद्भुत, वाह.’
वह गॉंव में रहता
था. मस्त था. बचपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में पांव रखने की ज़रूरत नहीं थी उसे. कुछ
साथ पढ़ने-लिखने वाले दोस्त थे तो कुछ बचपन
के संगी-साथी. उनके साथ समय मज़े में गुजर रहा था. खुल कर ठहाके लगाता था वह. दुनिया
से कोई ख़ास ग़िला शिक़वा न था. पढ़ने लिखने में भी ठीक ही था. कविताएं लिखता
था. प्यार की कविताएं. यही कविताएं एक दिन उसे शहर के एक बहुत बड़े अख़बार में
ले आईं.