शनिवार, 21 अप्रैल 2012

(लघुकथा) पॉवर

 
वह सरकार में अब बहुत बड़ा अफ़सर हो गया था. आज एक ज़माने बाद ननि‍हाल लौटा था. छुटपन में गर्मि‍यों की छुट्टि‍यां हालांकि‍ यहीं बीतती थीं उसकी. उसके आने से सभी बहुत प्रसन्‍न थे. वह अपने नाना के साथ खाट पर बैठा था. शुरूआती राजी-नावें के बाद उसके नाना हुक्‍का गुड़गुड़ा रहे थे. बढ़ती उम्र के चलते वे अब बात कम करते थे और उनके चेहरे की हँसी भी मुस्‍कान भर बन कर रह गई थी. 

वह खुले आसमान के नीचे दूर दूर तक फैली हरि‍याली  देख रहा था, बचपन की यादों में डूबता-उतराता हुआ.

चि‍लम की आग को नि‍हारते हुए उसके नाना ने कहा-‘गांव के बहुत बड़े नेता को शहर पहुंच कर और शहर के बहुत बड़े अफ़सर को गांव में आकर कि‍तना पॉवरलेस सा लगता है न ?’

उसके होठों पर हँसी दौड़ गई. उसने सि‍र घुमा कर अपने नाना को देखा. वे निर्वि‍कार भाव से हुक्‍का गुड़गुड़ा रहे थे.

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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

(लघुकथा) कहां कम्प्लेंट करे रुल्दू राम

रुल्‍दू राम बहुत दु:खी था. उसने नया मोबाइल कनेक्‍शन ख़रीदा था जि‍सका बि‍ल अनाप-शनाप ही नहीं आ रहा था, बल्‍कि‍ उस उल्‍टे-सीधे बि‍ल को भरने के तकाज़े को लेकर भी दि‍न में कई-कई बार फ़ोन आ रहे थे. वो कुछ कहने की कोशि‍श करता तो उसे बता दि‍या जाता कि‍ वे तो कॉल-सेंटर से केवल तकाज़ा वि‍भाग देखते हैं, कंप्‍लेंट के लि‍ए तीन डि‍जि‍ट वाले नंबर पर बात करे वो. उस नंबर पर कोई बात नही करता था बस एक के बाद बटन ही दबाते चले जाने के नए-नए मशीनी निर्देश आते रहते थे और अंत में यह कहा जाता था -'आप फलां डब्‍लू डब्‍लू डब्‍लू पर भी कंप्‍लेंट लॉज कर सकते हैं.’

इसे संकेत मान कर वह सर्वि‍स प्रोवाइडर की साइट पर गया तो उसे सबसे पहले ख़ुद को रजि‍स्‍टर कराने का नि‍र्देश मि‍ला, रजि‍स्‍टर करने की कोशि‍श की तो उसकी हैरानी और बढ़ाते हुए कम्‍प्‍यूटर ने बताया कि‍ उसके मोबाइल नंबर से तो वह पहले से ही रजि‍स्‍टर्ड है. लेकि‍न उसे न तो यूज़र आई. डी. पता थी न ही पासवर्ड इसलि‍ए अब वो कुछ नहीं कर सकता था. उसे कोई नहीं बता पाया कि‍ वह कहां जाकर शि‍कायत करे. शि‍कायत करने के लि‍ए बेवसाइट पर न तो कि‍सी का नाम था न ही कोई डेज़ि‍गनेशन और न ही भरोसे का फ़ोन नं., दफ़्तर का पता भी कि‍सी पोस्‍ट बॉक्‍स नंबर पे था.

रुल्‍दू राम ने अपना रोना एक जानकार के आगे रोया तो उसके जानकार ने राय दी –‘देखो भई, मैं तो इस तरह की कंपनि‍यों और ऐसे ही प्राइवेट बैंकों के बस एक-एक शेयर ख़रीद रख छोड़ता हूं. उसके बाद वो आए दि‍न अपनी पूरी जानकारी वाली वार्षि‍क-रि‍पोर्टें भेजते रहते हैं, मैं तो इनके डायरेक्‍टरों को उनके नाम से कम्‍प्‍लेंट भेजता हूं. फ़रक़ पड़ता है.’
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मंगलवार, 27 मार्च 2012

(लघु कथा) 21 दि‍सम्‍बर 2012

सुबह का अख़बार देखकर पत्‍नी जल्‍दी-जल्‍दी अंदर भागी. उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं. हालांकि‍ उसका परि‍वार कोई वी.आई.पी. परि‍वार नहीं था कि‍ उनके बारे में कोई समाचार छपता और, महंगाई या दुर्धटनाओं की ख़बरें भी उस जैसे मध्‍यवर्गीय परि‍वारों को अब नहीं डराती थीं. फि‍र भी वह बहुत चिंति‍त दि‍ख रही थी.

उसने पति‍ को जगाया -'सुनो जी, ख़बर छपी है कि‍ 21 दि‍सम्‍बर 2012 को दुनि‍या का अंत हो जाएगा. '
'उहुं, सोने दो भागवान.' - पति‍ ने करबट ली.
'वास्‍तु वाले एक बाबा ने भी इसकी पुष्‍टी कर दी है जी.'
पति‍ उठ बैठा -'क्‍या वार है उस दि‍न.'
'शुक्रवार' - पत्‍नी ने बताया. 
'उफ़्फ, ओ भगवान कम से कम शनि‍वार इतवार की छुट्टी तो ले लेने देता' - कह कर पति‍ ने फि‍र से चादर तान ली. 
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रविवार, 18 मार्च 2012

(लघुकथा) लीगल पेपर


वह आगे की पढ़ाई के लि‍ए गॉंव से शहर आया था. सुना-सुनी, बेचारे मॉं-बाप उसे बनाना तो चाहते थे डॉक्‍टर या इंजीनि‍यर पर लोगों ने ये भी बताया था कि‍ भई इसमें ख़र्चा बहुत होगा. सो उन्‍होंने रूखी-सूखी खा कर भी उसे वकील बनाने की ठानी. वह कानून की पढ़ाई कर रहा था.

कि‍सी दूसरे के साथ मि‍लकर कि‍राए पर एक कमरा ठीक कर लि‍या था उसने. मकान मालि‍क कमरे में ही रोटी भी बना लेने देता था. महीने के महीने गॉव से एक छोटा सा मनि‍ऑर्डर आता तो था पर कुछ ही दि‍न बाद हाथ फि‍र तंग होने लगता था उसका. एक दि‍न उसने कुछ और पैसे मंगवाने की जुगत बि‍ठाई और कंप्‍यूटर से प्रि‍न्‍ट लेने के बारे में लि‍खा –‘बाबा, लीगल पेपर की बहुत सख्त ज़रूरत है, जल्दी से साढ़े सात सौ रूपये और भेज दो.’

गॉंव में लीगल पेपर का मतलब कानून के पर्चे का ख़र्च पढ़ कर पैसे भेज दि‍ए गए. मुवकि्कलों से पैसे गांठने का यह उसका पहला पाठ था जो उसने अच्‍छे से पास कर लि‍या था.
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रविवार, 4 मार्च 2012

(लघुकथा) औरत और औरत

वो एक बहुत बड़ी बि‍ल्‍डिंग के काम पर लगी थी. सि‍र पर तसला-ईंट ढोती थी वो अधेड़ सारा दि‍न. लोग उसे ए कहकर बुलाते थे हालांकि‍ उसका नाम कमला था. शादीशुदा थी, मर्द भी वहीं-कहीं कुछ दूसरा काम देखता था. चारों तरफ धूल-मि‍ट्टी उड़ती, वो झट पल्‍लू से मुंह झाड़ लेती. कभी-कभार शरीर कुछ उघड़ भी जाता, बेलदार लोग मौज ले लेते, वो भी कम ज़ुबानज़ोर न थी, अच्‍छे से हड़का के ‘हत्‍त‘ कर देती. बीच बीच में बीड़ी भी पी लेती. शाम को थक हार कर उसका मरद कहीं से कच्‍ची ले आता तो कुछ वो भी खींच लेती.


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एक दि‍न, उस बि‍ल्‍डिंग की आर्कीटेक्‍ट वहां आई. ठेकेदारों से बात करते-करते उसने एक पतली सी सि‍ग्रेट सुलगा ली. कमला वहां से जाते हुए रूक कर उसे देखने लगी. आर्कीटेक्‍ट को पसंद नहीं आया, उसने दुत्‍कार दि‍या.

चली तो वो गई वहां से, पर उसे समझ नहीं आया कि‍ उसमें और उस सि‍ग्रेट पीने वाली औरत में फ़र्क़ क्‍या था जो उसने यूं डपट दि‍या.

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मंगलवार, 28 फरवरी 2012

(लघुकथा) भोलू की कहानी


वह एक मध्‍यवर्गीय परिवार से था. कुछ बड़ा हुआ तो उसे घर वालों ने एक स्‍कूल में भर्ती करवा दिया. घर पर उसे भोलू कहते थे सो स्‍कूल में उसका नाम भोलू चंद लिखवाया गया. तब अंग्रेज़ी स्‍कूलों का न तो रिवाज़ था न ही मध्‍यवर्गीयों की हैसियत थी भोलुओं को अंग्रेज़ी स्‍कूलों में भेजने की. उसने पढ़ाई-लिखाई हिन्‍दी से पूरी की. नौकरी मिली तो उसने पाया कि वहां दो दुनिया थीं, एक हिन्‍दी की दूसरी अंग्रेज़ी की. उसने ये भी देखा कि अंग्रेज़ी वालों की बात भी कुछ और ही थी. उसने फिर बड़ी मेहनत की और धीरे-धीरे वह अंग्रेज़ी वालों की जमात में शामिल हो गया.

एक दिन उसने अपने बेटे से उसकी बारहवीं की परीक्षा के बारे में बात की क्‍योंकि वह भी उसी की तरह गणित में कुछ कमज़ोर था –‘बेटा तुमने लघुत्‍तम समापवर्तक के सवाल तो पक्‍के कर लिए हैं न?
डैड, व्‍हाट डू यू मीन बाई लगुत्‍तम बत्‍तक ?’ – बेटे ने पूछा.

उसे लगा कि अचानक किसी ने उसका नाम भोलू चंद से बदल कर भोंदू चंद कर दिया है.
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रविवार, 26 फरवरी 2012

(लघु कथा) विमोचन


 
उसे जाने-माने साहित्‍यकारों की फ़ेहरिस्‍त में शामिल होने की को‍शिश करते करते ज़माना बीत गया. जाने-माने तो क्‍या, उसके ख़ुद के अलावा कोई दूसरा उसे साहित्‍यकार तक कहने को तैयार न होता था. पर किस्‍मत का खेल देखो, एक दिन उसे किसी की पुस्‍तक के विमोचन का न्‍योता आ गया. समारोह में जाने के लिए वह ख़ुशी-ख़ुशी बालों में खिजाब लगाने की तैयारी करने लगा.

पत्‍नी की आवाज आई –‘क्‍यों बाल काले कर भद पिटवाना चाहते हो, देखा नहीं कि किताबें रिलीज़ करने वालों के बाल सफ़ेद होना कितना ज़रूरी होता है.’

उसे ठीक वैसा ही लगा जैसा पहली बार किसी जवान बच्‍चे के उसे पहली बार अंकल कह कर पुकारने पर लगा था. तब उसे ध्‍यान आया कि –‘अरे ! अपनी तो पूरी उम्र ही बीत गई.’
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