शुक्रवार, 21 मार्च 2014

(ग़ज़ल) बड़े लोग



जो मुझसे बड़े हैं
बैसाखी पे खड़े हैं.

देखो न आदमकद
दुगने तो गड़े हैं.

मेरी सुनेंगे क्या
वो तो खुद अड़े हैं.

हारने का ख़ौफ़ दो
उन्हें, जो न लड़े हैं.

पलटता नहीं हूं मैं
मेरे फ़ैसले कड़े हैं.
00000

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह...
    बढ़िया ग़ज़ल.......
    पैनी कलम है...चाहे शब्द हों चाहे कार्टून.....
    :-)
    अनु

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  2. वाह! ग़ज़ल पढ़कर
    हम अवाक खड़े है !!!

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  3. शानदार कूची चली है
    रचना नशा सर चढ़े हैं

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  4. बहुत सुंदर लिखते हैं आप ! बहरहाल भावनात्मक स्तर पर हमें जो खटक रहा है उसे भी दर्ज़ कराना ज़रुरी है :)

    दोगुना जमीन पे गड़े होने के बावजूद बैसाखियों पे खड़े होना ? (1 विरुद्ध 2 )

    जो बड़े (शायद ज्यादा अनुभवी / आदमकद का बड़प्पन?) हैं वो छोटों (कम अनुभवी ?) की सुने क्यों (1 विरुद्ध 3 )

    माने लड़ंकों / झगड़ालुओं से खौफ खाओ ? और शांत प्रकृति लोगों को भयभीत करो, धोबी और गधे वाली कहावत (4)

    हर हालात पे बला की जिद है , शायद अपनी मुर्गी की डेढ़ टांग जैसा (5)

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  5. बचपन में एक कविता पढ़ी थी -
    'बड़ा कौन है मुझे बताओ ,क्या जो हाथी पर चढ़ता है .
    या जो अपना दोष सफ़ाई से दुसरों के सिर मढ़ता है .'
    - अब लगने लगा है कि जो ऐसा कर सकता है ,सचमुच वही बड़ा है .

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  6. किसको छोटा किसे बड़ा कीजे.
    सब बराबर है अब मज़ा कीजे

    बलग़मी है सिफत बलागों की,
    थूंक कर साफ़ अब गला कीजे.
    - See more at: http://mansooralihashmi.blogspot.com/search?q=%E0%A4%AC%E0%A5%9C%E0%A4%BE+%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8+#sthash.649HowPB.dpuf

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  7. Shero Shaayari mein bhi aap shouk farmaate hain, maaloom na tha. Sundar.

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