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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) जंगल



उसकी माँ पुराने ज़माने की थी. जब भी परिवार का कोई, अस्पताल में भर्ती होता तो उसकी माँ अस्पताल पहुंचते ही आसपास के लोगों से बातचीत शुरू कर देती चाहे मरीज़ हों या उन्हें देखने वाले. वार्ड बॉय हो या नर्स, आगे बढ़-बढ़ के सबसे बात करती. डॉक्टर आते तो उन्हें भी एक बात पूछने पर चार  बताती. उसके बच्चों को यह सब पसंद नहीं था. एक दिन बेटे ने टोक दिया.
 
'बेटा जंगल में जब जानवर कहीं जाते हैं न, तो इकट्ठे चलते हैं. इकट्ठे चलने से उनमें हिम्मत बनी रहती है. यहां अस्पलातों में भी लोग अकेले ही होते हैं, उनका साथ देने से उनकी भी हिम्मत बढ़ती है. ये अस्पताल हमारे जंगल हैं.'- मां ने बेटे को समझाया.


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बुधवार, 5 सितंबर 2012

(लघु कथा) जंगल





वह जंगल में कहीं खो गया था.
जंगल बहुत घना था और रात का अंधेरा घि‍रने को था, दि‍न का उजाला कम हो रहा था. उसे हर तरह के जंगली जानवरों का भी डर था. उसके पास अपना बचाव करने को कुछ नहीं था.

उसने तय कि‍या कि‍ उसे इन हालात से बच नि‍कलने के लि‍ए ठंडे दि‍माग़ से सोचना होगा. वह एक जगह बैठ गया और उसने फ़ैसला कि‍ उसके बचने का एक ही रास्‍ता है और वह है, कि‍सी भी एक दि‍शा में चल नि‍कलना...
तभी उसकी नींद खुल गई.

उसे लगा कि‍ उसके जीवन में भी यही एक ही रास्‍ता है.

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