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बुधवार, 16 सितंबर 2015

(लघुकथा) कि‍ताबें



वह कड़े जीवट वाला सीधा सा इन्‍सान था. नौकरी की खोज में गांव से शहर आया था. पढ़ने का शौक उसे पत्रकारि‍ता में ले गया. ईमानदारी से नौकरी की और उतनी तरक्‍की भी पायी जि‍तनी एक ईमानदार को मि‍लती है, इसलि‍ए पूरी ज़िंदगी तंगी में गुजारी. पर उसे कभी कि‍सी से कोई शि‍कायत नहीं रही. कि‍ताबें इकट्ठी करना, ख़रीदना, पढ़ना और उन्‍हें संजो कर रखना उसने कभी नहीं छोड़ा. कि‍ताबें ही उसकी दुनि‍या थीं. उसके पास हज़ारों कि‍ताबें थीं.

एक दि‍न, कि‍ताब से सि‍र उठा कर देखा तो पाया कि‍ बीमार रहने वाली पत्‍नी चल बसी है, इकलौता बेटा कहीं क्लर्की कर रहा है, बहू घर संभाल रही है. और वह अब ख़ुद बीमार रहता है. उस रात उसे नींद नहीं आई, वह पूरी रात करवटें बदलता रहा. सुबह, बेटे और बहू को अपने पास बि‍ठा कर उनसे बस इतना ही कहा–‘मेरे जाने के बाद, इन कि‍ताबों को यहीं रहने देना. इन्‍हें घर से मत नि‍कालना.
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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) प्रकाशक




एक बहुत बड़ा प्रकाशक था. हर साल बहुत सी कि‍ताबें छापता था. जगह-जगह होने वाले पुस्‍तक मेलों में हर साल स्‍टॉल लगाता, जहां कुछ कि‍ताबों का वि‍मोचन करवाता तो कुछ का लोकार्पण. वह हर मेले में केवल नई छपी कि‍ताबें बेचने के लि‍ए ही जाना जाता था. धंधा अच्‍छा चल रहा था.

इस साल भी उसने आने वाले पुस्‍तक मेले में स्‍टॉल बुक करवा दि‍या था, पर जब मेला शुरू हुआ तो इस बार उसके स्‍टॉल पर कि‍ताबें नहीं बल्कि कि‍ताबों सी दि‍खने वाली प्‍लेन कॉपि‍यां बि‍क रही थीं. उसके यहां नि‍यमि‍त आने वाले लोगों को लगा कि शायद उसने पुस्‍तक-प्रकाशन के बजाय स्‍टेश्‍नरी का काम शुरू कर दि‍या है. इस बार वह ख़ुद भी स्‍टॉल पर नहीं मि‍ला, उसकी जगह कोई कर्मचारी बैठा हुआ था.
  
पूछने पर उस कर्मचारी ने बताया –‘’साब, लालाजी लेखकों को पैसा-धेला तो देते नहीं थे सो, इस बार सबने मि‍लके इनको कुछ भी लि‍ख कर देने से मना कर दि‍या. लेकि‍न प्रिंटिंग वाले ने तो एडवांस लेकर अपना काम फि‍ट रखा हुआ था, उसने तो बि‍ना कुछ छापे ही ये कॉपी जैसी दि‍खने वाली कि‍ताबें हमें थमा दीं. अब, क्योंकि इस स्‍टॉल की बुकिंग का रि‍फ़ंड मि‍लना नहीं था सो, लालाजी ने सोचा कि कि‍राया भी बट्टेखाते में जाए इससे बढ़ि‍या है कि ये कॉपि‍यां बेच कर ही चार पैसे कमा लि‍ए जाएं. आपको कि‍तनी कॉपी दूं साब.’’

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