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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

(लघुकथा) समीक्षक



वह बहुत बड़े समीक्षक थे. इतने बड़े कि‍ बहुत से लोग तो डर के मारे कोशि‍श भी नहीं करते थे कि‍ उनका काम वे देखें, न जाने क्‍या क्‍या नुक़्स नि‍काल दें और उनकी कृति‍ जन्‍म लेते ही धराशायी हो जाए. तमाम पत्र-पत्रि‍काओं में उनके समीक्षा कॉलम चलते थे. टी.वी. चैनलों पर ति‍रछे बैठ कर बातें करते थे. समीक्षकी के सि‍लसि‍ले में देश-वि‍देश आना जाना लगा रहता था.

एक दि‍न उनका, एक कलाकार मि‍त्र के घर जाना हुआ. जैसे ही घर पहुंचे तो देखते क्‍या हैं कि‍ कमरे में ज़मीन पर एक छोटी सी एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट पेंटि‍ग रखी है. उसे देखते ही उनके मुँह से नि‍कला –‘वाह वाह वाह क्‍या बात है. जीवन, प्रकृति‍ और ब्रह्माण्ड का ऐसा अद्भुत चि‍त्रण मैंने पहले कभी नहीं देखा. भगवान ने नि‍श्‍चय ही तूलि‍का से ही ब्रह्माण्ड की रचना की होगी, भगवान वैज्ञानि‍क नहीं कलाकार रहा होगा, पक्‍का. कोई एक ही रंग से भी ऐसी कलाकृति‍ बना कैसे सकता है, मैं तो सोच भी नहीं सकता. इसमें रंगों की छाया का सांमजस्‍य अद्भुत है अद्भुत, वाह.’

उनके मि‍त्र ने भीतर की तरफ देखते हुए आवाज़ दी -‘बाई, जरा इधर आना. देखो तो तुम्‍हारी लापरवाही की ये साहब कैसी तारीफ कर रहे हैं.’ फि‍र उनकी तरफ मुड़ कर बोले–‘हमारी कामवाली ने कैनवस पे ग़लती से ये रंग गि‍रा दि‍या था.’

इस बीच कामवाली बाई परेशान सी दौड़ती चली आई और आकर कि‍नारे खड़ी हो गई.
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शनिवार, 2 नवंबर 2013

(लघुकथा) शहर


वे प्रकृति के चि‍तेरे रहे.‍ प्रकृति चित्रण करते करते सत्‍तर बसंत कब उन्‍हें लॉंघ गए पता ही न चला. मान-सम्‍मान-पुरस्‍कार सब कुछ मि‍ला उन्‍हें. अगली पीढ़ी ने चि‍त्रकला उनसे वि‍रासत में पाई. पुत्र भी जाना माना चि‍त्रकार है और पोता भी उन्‍हीं के पदचि‍न्‍हों पर चल नि‍कला. उन दोनों के चि‍त्रों में भी प्रकृति ही रंग भरती है.

उन्‍होंने प्रकृति‍ की गोद में बसे एक गांव में जब पहले-पहल ऑंखें खोलीं तो ऊपर बि‍छा असीम नीला आसमान पाया. बस वही उनमें बस गया. उनके हर चि‍त्र का नीला आकाश उनकी पहचान बन गया. एक दि‍न वे शहर आ बसे. बेटा यहीं पला बढ़ा. उसके चि‍त्रों में भी आसमान की छटा देखते ही बनती है. पर वह आसमान, नीला नहीं सलेटी रंगता है.

पर अब वे पोते के बने चि‍त्र देखते हैं तो कुछ दुखी दिखते हैं क्‍योंकि‍ वह आसमान को काले रंग में बनाने लगा है.
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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

(लघुकथा) कलाकारी



एक बहुत बड़े साहब थे. काम-धंधे वाले बड़े-बड़े लोग उनकी जी-हज़ूरी और कैश-सेवा में रहते थे. इसीलि‍ए तन्‍ख्‍वाह ज़्यादा न होने पर भी उनका रहन-सहन ठस्‍से का था. कभी-कभी कानून का चिंतन हो आता तो मनन करने लगते. एक दि‍न इसी मनन से प्रकाश प्रकट हुआ तो वे ख़ुद फ़ोटोग्राफ़र हो गए और उनकी घरघुस्‍सू बीवी पेंटर. अब दोनों ही, आए दि‍न प्रदर्शनि‍यां लगा-लगा कर फ़ोटुएं और पेंटिंग्‍स बेच नावॉं काट रहे हैं. दस-पंदह हज़ार रूपए की कीमत वाली एक कॉफ़ी टेबल बुक पर भी काम चल रहा है.

साहब का ड्राइवर भी पेपर-श्रैड्डिंग मशीन की एजेंसी लेने की सोच रहा है क्‍योंकि‍ लोग फ़ोटो और पेंटिंग्‍स ख़रीद कर, धीरे से उसे ही गि‍फ़्ट में दे जाते हैं.
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