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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

(लघुकथा) सजा


वह एक बहुत घाघ कि‍स्‍म का इन्सान था. उसके पैंतरों से कि‍सी का भी बच पाना बहुत मुश्‍कि‍ल था.  वह कि‍सी को बख्‍शता भी नहीं था. जो मि‍ल गया उसे ही कि‍सी न कि‍सी भाव नप लेता था.  और तो और, एक दि‍न  वह भगवान से अड्डा लगा बैठा. और घुंडी भी ऐसी फंसाई कि‍ भगवान भी शह-मात पर आ कर ठि‍ठक गया. भगवान ने कहा चलो ठीक है, दो वरदान मांग लो.
’मैं बहुत बड़ा आदमी बनूं.’
‘तथास्‍तु.’
’और मेरी मूर्ती, देश के सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍थान पर लगे.’
‘तथास्‍तु.’ और इसके साथ ही भगवान अंतर्ध्‍यान हो गए.
भगवान का वचन था, पूरा तो होना ही था. वह इतना बड़ा आदमी बना कि‍ उसके अनुयायि‍ओं ने उसकी एक बहुत बड़ी मूर्ती देश की राजधानी के बीचोबीच लगा दी.

अब उसकी मूर्ती वहां चौबीसों घंटे धुऑं फांकती है और कबूतर उस पर बीठ करते रहते हैं.
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