बुधवार, 20 मई 2015

(लघुकथा) न्यायकथा




गांव में वे दोनों आसपास रहते थे. दोनों की कुछ-कुछ पुश्‍तैनी ज़मीन थी, वह भी साथ-साथ ही थी. कभी मेड़़, कभी पेड़, कभी घास, कभी बच्चे, कभी औरतें, कभी कुछ कभी कुछ ...मतलब ये कि‍ आए दि‍न कि‍सी न कि‍सी बात को लेकर दोनों में लड़ाई-झगड़ा होता ही रहता था. कभी गाली-गलौज तो कभी-कभी बात हाथा-पाई तक पहुंच जाती थी. आए दि‍न पंच-पंचायत भी होती. एक दि‍न, कि‍सी पेड़ की छंटाई को लेकर बात इतनी बढ़ी कि‍ एक ने दूसरे की हत्‍या ही कर दी.

पुलि‍स आई, तहकीकात हुई, केस बना, हत्‍यारे को जेल भेज दि‍या. कोर्ट-कचेहरी होने लगी. दि‍न, महीने, साल बदलने लगे. गवाह कभी जाते, कभी न जाते. जज आते, चले जाते. गवाह वाकया भूलने लगे तो वकील-लोग केस की तारीख़ें. दोनों के परि‍वारों के बच्‍चे बड़े होते रहे, इस बीच उनकी शादि‍यां भी होने लगीं. बेटि‍यां जाने लगीं, नई बहुएं आने लगीं. बीच-बीच में, उनके पोते-पोति‍यों को केस के बारे में भी बताया जाता. दोनों के परि‍वारों में दुश्‍मनी तो बनी रही पर कोर्ट-कचेहरी करते-करते थक चले थे वे. 
 
एक दि‍न, ऐसा भी आया कि‍ पर्याप्‍त सबूतों के अभाव में कचेहरी ने उसे बरी कर दि‍या. उसके परि‍वार में कोई ख़ास खुशी नहीं थी. हां यह बात अलग है कि‍ दोनों ही परि‍वारों ने चैन की सांस ली कि‍ चलो काले कोट वालों से पीछा छूटा. 

वह अब बूढ़ा हो चुका था. उसकी पीठ झुक चुकी थी. उसकी हुक्‍के की आदत अब बीड़ी में बदल गई थी. 

एक दि‍न, वह उसी झगड़े वाले पेड़ के नीचे बैठ, बीड़ी पीते हुए याद करने की कोशि‍श कर रहा था कि‍ आखि‍र उस दि‍न हुआ क्‍या था.
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शनिवार, 18 अप्रैल 2015

लघुकथा (खुशी)



बहुत पुरानी बात है, दूर कि‍सी देश में एक छोटी सी राजकुमारी रहती थी, बहुत सुंदर बहुत चंचल. राजा-रानी की वह इकलौती संतान थी. प्रजा की भी आंख का तारा थी वह राजकुमारी. महल भर में उसकी कि‍लकारि‍यां गूंजतीं रहतीं और साथ-साथ दासि‍यों के हंसने की आवाजें भी हवा में तैरतीं रहतीं.

न जाने भाग्‍य में क्‍या बदा था कि,‍ एक दि‍न, राजकुमारी बीमार पड़ गई. राजवैद्य ने हर प्रयास कर देख लि‍या, राज्‍यभर से हर तरह के दूसरे वैद्य भी बुलाए गए पर राजकुमारी की बीमारी का हल न नि‍कला. राजकुमारी की हंसी न जाने कहां खो गई थी. वह उदास रहने लगी. उसकी खि‍लखि‍लाहटें जाती रहीं. वह अब खेलती भी न थी. उसे खाने-पीने में भी रूचि‍ न रही, उसकी भूख तो जैसे सदा के लि‍ए ही मर गई थी. महल में खि‍न्‍नता छाई रहने लगी, राज्‍य में अब उत्‍सव भी न होते थे. चारों ओर बस उदासी ही उदासी दि‍खई देती थी. राज्‍य की प्रजा दुखी थी.

एक दि‍न राजकुमारी महल में, कमरे की खि‍ड़की के पास बैठ उदास नजरों से यूं ही बाहर देख रही थी कि‍ अचानक, हवा का एक ठंडा सा झोंका आया और तभी उसने देखा कि‍ बाहर बगीचे में उसके ही जैसी एक छोटी सी बच्‍ची हाथ में फूल लि‍ए हंसते-खि‍लखि‍लाते ति‍तलि‍यों के पीछे भाग-दौड़ रही है. राजकुमारी ने आंखें बंद कर लीं और उसने एक गहरी सांस ली. उसके चेहरे पर एक हल्‍की सी मुस्‍कान तैर गई. अगले ही पल उसने आंखें खोलीं तो उसके चेहरे पर पहले सी ही खुशी लौट आई थी.

यह ख़बर महल और प्रजा में आग की तरह फैल गई. राज्‍यभर की खुशि‍यां लौट आई थीं.
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सोमवार, 23 मार्च 2015

(लघुकथा) आटा



सड़क कि‍नारे उसके पास थोड़ी सी ज़मीन थी. उसी पर कुछ अपनी खेती, कुछ खेती बटाई पर लेकर परि‍वार का पेट पाल रहा था. फसल के दि‍नों पूरा परि‍वार जुटकर मेहनत करता. फि‍र फसल का इंतज़ार और अपनी गाय की सेवा.

एक दि‍न गांव में एक लाला जी आए और समझा-बुझाकर उससे ज़मीन खरीद ली. उस ज़मीन पर गेट-चारदीवारी बनाकर एक शैड सा डाल दि‍या. वह गांव के बाहर, ज़मींदार जी के अहाते में कि‍राए पर रहने लगा. बेटे को मोटर साइकि‍ल ले दी. सबने नए-नए कपड़े सि‍लाए, औरतों के लि‍ए पहली बार गहने भी आए. सूमो गाड़ी करके सब रि‍श्‍तेदारों के यहां घूमे. जो पैसा बचा रहा उसे बैंक में जमा कर दि‍या. लाला जी ने उसे चौकीदार रख लिया और बड़े बेटे को मज़दूरी पर. घर के बाकी लोग भी लाला जी की फैक्‍ट्री से माल घर ले जाते और उस पर छोटा मोटा काम करके लौटा देते, उन्‍हें भी चार पैसे मि‍ल जाते. थैली में आटा-दाल ला कर खाते और सो रहते. जब कभी लाइट न होती या कभी ऑर्डर न होते, या फि‍र लाला जी ही नहीं होते तो काम बंद रहता. दि‍हाड़ी भी उसी हि‍साब से कट जाती. एक दि‍न पता चला कि‍ लाला जी ने काम बंद कर दि‍या क्‍योंकि‍ काम ठीक नहीं चल रहा था और सरकारी टैक्‍स की रि‍यायत भी ख़त्‍म हो गई थी.

उस शाम जब वह आटा ख़रीदने दुकान पर गया तो उसने फि‍र रेडि‍यो पर सुना कि‍ कि‍सी और कि‍सान के अात्‍महत्‍या कर लेने की ख़बर आ रही थी. 
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शुक्रवार, 20 मार्च 2015

(लघुकथा) मॉडल






वह एक आम लड़की थी. अपनी सीधी-सादी ज़िंदगी चुपचाप जी रही थी. बि‍ना कि‍सी ख़ास शि‍कायत या उम्‍मीद के. हालांकि‍ उसे इस बात का एहसास था कि‍ उसके पास सोशल सर्कल नहीं है. पर उसने बचपन से ही, इस बारे में न कभी कोई ख़ास कोशि‍श की, न ही कभी परवाह. दूसरों की बातों से भी उसे कभी कोई ख़ास मतलब नहीं रहा लेकि‍न हां, पर्सनल कमेंट उसे अच्‍छे नहीं लगते थे. या तो, वह उन पर रि‍एक्‍ट नहीं करती थी या फि‍र मुंह बना कर नि‍कल जाती.

एक बार कहीं, कि‍सी मॉडल को-ऑर्डि‍नेटर की नज़र उस पर पड़ी. उसने, उसे रैम्‍प पर मॉडलिंग का ऑफर दि‍या तो पल भर में पूरी ज़िंदगी उसकी ऑंखों के सामने से फ़्लैक बैक की तरह गुज़र गई. उसने ट्रेनिंग ली. ट्रेनिंग में उसके साथ उसी के जैसी और भी बहुत सी लड़कि‍यां, पहली बार ट्रेनिंग ले रही थीं. शो हुआ. वह भी रैम्‍प पर इठला और इतरा कर चली. कैमरों के फ़्लैश चमकते रहे, तालि‍यां बजीं. शो खत्‍म हुआ. उसके पांव ज़मीं पर न थे. उसे कल सुबह के अख़बारों में शो की फ़ोटो और ख़बरों से ग्‍लैमर की दुनि‍या में, एक छोटे शहर से आकर छा जाने वाली लड़की साफ दि‍खाई दे रही थी. खुशी के मारे उसे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह के अंग्रेज़ी अख़बार में फ़ैशन शो पर रपट थी ‘फ़ैशन अब केवल खूबसूरत लड़कि‍यों के लि‍ए ही नहीं है.’ अब कमरे से नि‍कलने की उसकी हि‍म्‍मत नहीं हो रही थी. वह कहीं, कि‍सी ऐसी जगह छुप जाना चाहती थी जहां कोई उसे ढूंढ न सके, देख न सके.
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