रविवार, 26 जुलाई 2015

(लघुकथा) समय




वह बचपन से ही माता पि‍ता के साथ शहर में रह कर पला बढ़ा. और फि‍र आगे की पढ़ाई करने के लि‍ए वह अमरीका चला गया था. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अब वहीं नौकरी कर रहा था और उसे ग्रीन कार्ड भी मि‍ल गया था. वह लंबे समय बाद भारत लौटा था और आजकल समय नि‍काल कर अपने पुश्तैनी गांव आया हुआ था. गांव आकर उसे लगा कि‍ समय जैसे ठहर सा गया है. सब कुछ लगभग वैसा ही लग रहा था जैसा वह बचपन में देखा करता था. 

आज वह अपने अनुभव सुनाता हुआ दादा के साथ खेतों की ओर जा रहा था, कि‍ वह वहां कैसे-कैसे पढ़ा, कैसे रहा, कैसे वह अब एक बहुत बड़े दफ़्तर में वहां के लोगों के साथ काम करता है. उसके दादा बड़े ध्यान से सुनते चल रहे थे. वह बता रहा था कि‍ वहां की एक बात जो उसे सबसे अच्‍छी लगी, वह थी वहां अनजान लोगों का भी एक दूसरे को देख कर मुस्‍कुराना और हाय-हैलो करके करते हुए नि‍कलना. तभी कंधे पर झोला टांगे सामने से आते हुए एक अधेड़ आदमी ने पास आने पर कहा –‘दद्दा राम राम.’ जवाब में उसके दादा ने भी राम-राम कही और दोनों आगे नि‍कल गए. उसने पूछा कि‍ दादा जी यह कौन था. दादा ने कहा –‘पता नहीं बेटा. कोई राहगीर होगा. खैर, तुम क्‍या कह रहे थे...‘    

उसने कुछ नहीं कहा और दादा के साथ-साथ चलने लगा.
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

(लघुकथा) चोरी



'अजी सुनते हो, सेफ़्टी पिन नहीं मिल रहीं. कहीं देखीं ?’

'तुमने ही इधर-उधर रख दी होंगी. ध्यान से ढूंढो.

उसने बुदबुदाते हुए ड्रॉअर और अल्मारियां बारी-बारी से खोलनी शुरू कर दीं – ‘दि करता है, आज ही काम से निकाल दूं इसे. जब देखो तब कुछ कुछ चुपचाप उठाकर ले जाती है. और अगर पूछो तो ऐसे एक्टिंग करती है मानो इस तरह की चीज़ तो कभी हमारे घर में थी नहीं शायद.'

वह अख़बार तो पढ़ रहा था पर देख भी रहा था किआज ड्रॉअर और अल्मारियां खोलने-बंद करने की आवाज़ कुछ ज्यादा ही तेज़ थी. उससे नहीं ही रहा गया, पत्नी बुलाया तुम इसे काम से निकाल ही क्यों नहीं देतीं .'

निकाल तो एक मिनट में दूं पर दूसरी कामवाली इतनी आसानी से मिलती कहां है.'

यही तो समझाने की कोशि कर रहा हूं. यह इतने सालों से हमारे यहां काम कर रही है सिवाय छोटी-मोटी चीज़े ले जाने के क्या तुम्हें कभी कोई और शिकायत हुई इससे. मन लगा के काम अच्छा करती है. बिना बात छुट्टियां नहीं करती. इधर-उधर चुगलियां नहीं गाती. अगर हर महीने दो-चार सौ रूपए की चीज़ें यूं ले भी जाती है तो तुम ये मान क्यों नहीं लेतीं किचलो तुमने उसकी तन्ख्वाह ही दो-चार सौ रूपए बढ़ा दी.'

आज वह कुछ नहीं बोली और मुस्कुरा कर टेलिविजन देखने बैठ गई.
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