शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) प्रकाशक




एक बहुत बड़ा प्रकाशक था. हर साल बहुत सी कि‍ताबें छापता था. जगह-जगह होने वाले पुस्‍तक मेलों में हर साल स्‍टॉल लगाता, जहां कुछ कि‍ताबों का वि‍मोचन करवाता तो कुछ का लोकार्पण. वह हर मेले में केवल नई छपी कि‍ताबें बेचने के लि‍ए ही जाना जाता था. धंधा अच्‍छा चल रहा था.

इस साल भी उसने आने वाले पुस्‍तक मेले में स्‍टॉल बुक करवा दि‍या था, पर जब मेला शुरू हुआ तो इस बार उसके स्‍टॉल पर कि‍ताबें नहीं बल्कि कि‍ताबों सी दि‍खने वाली प्‍लेन कॉपि‍यां बि‍क रही थीं. उसके यहां नि‍यमि‍त आने वाले लोगों को लगा कि शायद उसने पुस्‍तक-प्रकाशन के बजाय स्‍टेश्‍नरी का काम शुरू कर दि‍या है. इस बार वह ख़ुद भी स्‍टॉल पर नहीं मि‍ला, उसकी जगह कोई कर्मचारी बैठा हुआ था.
  
पूछने पर उस कर्मचारी ने बताया –‘’साब, लालाजी लेखकों को पैसा-धेला तो देते नहीं थे सो, इस बार सबने मि‍लके इनको कुछ भी लि‍ख कर देने से मना कर दि‍या. लेकि‍न प्रिंटिंग वाले ने तो एडवांस लेकर अपना काम फि‍ट रखा हुआ था, उसने तो बि‍ना कुछ छापे ही ये कॉपी जैसी दि‍खने वाली कि‍ताबें हमें थमा दीं. अब, क्योंकि इस स्‍टॉल की बुकिंग का रि‍फ़ंड मि‍लना नहीं था सो, लालाजी ने सोचा कि कि‍राया भी बट्टेखाते में जाए इससे बढ़ि‍या है कि ये कॉपि‍यां बेच कर ही चार पैसे कमा लि‍ए जाएं. आपको कि‍तनी कॉपी दूं साब.’’

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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) छोटू




वाह गांव से नया-नया शहर आया था. उसके कि‍सी रि‍श्‍तेदार ने उसे हमारे दफ़्तर में, प्राइवेट सि‍क्‍योरि‍टी एजेंसी के गार्ड की ड्यूटी पर लगवा दि‍या था. यह दफ़्तर एक बहुमंज़ि‍‍ला इमारत में था. उसका बदन छरहरा था और वह पांच फुट का सा लगता था. सि‍क्‍योरि‍टी एजेंसी की वर्दी और टोपी उसके साइज़ से बड़े जान पड़ते थे. दफ़्तर के चपरासी- ड्राइवर वगैहरा आते-जाते उससे हंसी मज़ाक कर लेते.  वह दफ़्तर में आने जाने वाले हर अफ़सर को गेट पर खुशी-खुशी सलाम करता. कुछ अफ़सर लोग बि‍ना उसकी तरफ देखे कभी-कभी जवाब में सि‍र भी हि‍ला देते थे. 

एक शाम, आफ़ि‍स से नि‍कलते हुए मैंने देखा कि‍ वह गेट के पास ही दीवार से पीठ टि‍काए ख़ड़ा था. आज वह वर्दी में नहीं था. उसने अपने गले में पड़े गमछे से मुंह पोंछते हुए मुझे ढीली सी नमस्‍ते की. उसकी जगह कोई नया सि‍क्‍योरि‍टी गार्ड साथ खड़ा था.  मैं रोज़ की तरह, जवाब में सि‍र हि‍ला कर गाड़ी की तरफ नि‍कल गया. पीछे-पीछे ड्राइवर भी आ गया. गाड़ी में बैठते हुए मैंने पूछा कि‍ क्‍या हुआ, आज वह लड़का इतना ढीला सा क्‍यों लग रहा था.

‘’कौन साब, वो छोटू ?’’ उसने सवाल पूछा. ‘’साब एजेंसी के ठेकेदार को आज ही पता चला कि‍ इसकी तो उम्र अभी अट्ठारह साल भी नहीं हुई है, इसीलि‍ए काम से नि‍काल दि‍या. सि‍क्‍योरि‍टी एजेंसी के गार्ड और घासीराम कोतवाल में कहां कुछ फरक है साब.’’- फि‍र गाड़ी को गेयर में डालते हुए उसने जवाब दि‍या.
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शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) लोकतंत्र .


दो लोग बातें करते जा रहे थे.


-‘’यार मुझे समझ नहीं आता कि‍ क्‍यों ये चौधरी जब देखो तब डंडा ले कर कि‍सी न कि‍सी दूसरे देश को हड़काने चला ही रहता.’’

- ‘’ क्‍योंकि इसे दुनि‍या के हर देश में लोकतंत्र स्‍थापि‍त कर देना है न, इसीलि‍ए.’’

- ‘’लेकि‍न इसे लोकतंत्र की इतनी चिंता रहती क्‍यों है ?’’

-‘’ क्‍योंकि‍ लोकतंत्र वाले देशों से तेल नि‍चोड़ना आसान होता है.’’

-‘’ मतलब ? ’’

-‘’ मतलब ये कि‍ कि‍सी भी देश का तानाशाह कि‍सी दूसरे की मेहरबानी से सत्‍ता में नहीं होता. जबकि‍ लोकतंत्र के रास्‍ते कुर्सी तक भेजे जाने वालों की कोहनी तो कभी मरोड़ी जा सकती है न. ’’


इसी तरह बात करते-करते वे आगे नि‍कल गए.

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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

(लघुकथा) पुण्‍य




उसके पिता बहुत बीमार रहने लगे थे और देखते ही देखते एक दिन वो चल बसे. वह बहुत दुखी था. सबने समझाया - 'कुछ नहीं हो सकता, जिसकी जितनी लिखी है उतनी ही जीता है. अब तुम उनका संस्कार अच्छे से करो, बस यही उनके साथ जाएगा.'

उसे बात जम गई, और उसने फ़ैसला किया कि दुनिया भर को भोज करवाने के बजाय क्यों न वह अनाथालय में एक दिन का खाना खिलवाए. उसने बात की तो उसे बताया गया कि एक रात्रिभोज का ख़र्चा    ढाई हज़ार रूपये आएगा पर अगर वह स्पेशल खाना खिलवाना चाहे तो कुल तीन हज़ार रूपया लगेगा. वह तीन हज़ार रूपये निकाल कर दे आया कि भई जब खाना खिलाना ही है तो क्यों न अच्छे से ही खिलाया जाए, पुण्यकार्य में पाँच सौ रूपये क्या देखने.

उस रात अनाथालय में, खाने से पहले दिवंगत आत्मा की शाँति के लिए विशेष प्रार्थना की गई और पाँच सौ रूपये के दो मुर्गे अलग से काटे गए.
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