शनिवार, 18 अप्रैल 2015

लघुकथा (खुशी)



बहुत पुरानी बात है, दूर कि‍सी देश में एक छोटी सी राजकुमारी रहती थी, बहुत सुंदर बहुत चंचल. राजा-रानी की वह इकलौती संतान थी. प्रजा की भी आंख का तारा थी वह राजकुमारी. महल भर में उसकी कि‍लकारि‍यां गूंजतीं रहतीं और साथ-साथ दासि‍यों के हंसने की आवाजें भी हवा में तैरतीं रहतीं.

न जाने भाग्‍य में क्‍या बदा था कि,‍ एक दि‍न, राजकुमारी बीमार पड़ गई. राजवैद्य ने हर प्रयास कर देख लि‍या, राज्‍यभर से हर तरह के दूसरे वैद्य भी बुलाए गए पर राजकुमारी की बीमारी का हल न नि‍कला. राजकुमारी की हंसी न जाने कहां खो गई थी. वह उदास रहने लगी. उसकी खि‍लखि‍लाहटें जाती रहीं. वह अब खेलती भी न थी. उसे खाने-पीने में भी रूचि‍ न रही, उसकी भूख तो जैसे सदा के लि‍ए ही मर गई थी. महल में खि‍न्‍नता छाई रहने लगी, राज्‍य में अब उत्‍सव भी न होते थे. चारों ओर बस उदासी ही उदासी दि‍खई देती थी. राज्‍य की प्रजा दुखी थी.

एक दि‍न राजकुमारी महल में, कमरे की खि‍ड़की के पास बैठ उदास नजरों से यूं ही बाहर देख रही थी कि‍ अचानक, हवा का एक ठंडा सा झोंका आया और तभी उसने देखा कि‍ बाहर बगीचे में उसके ही जैसी एक छोटी सी बच्‍ची हाथ में फूल लि‍ए हंसते-खि‍लखि‍लाते ति‍तलि‍यों के पीछे भाग-दौड़ रही है. राजकुमारी ने आंखें बंद कर लीं और उसने एक गहरी सांस ली. उसके चेहरे पर एक हल्‍की सी मुस्‍कान तैर गई. अगले ही पल उसने आंखें खोलीं तो उसके चेहरे पर पहले सी ही खुशी लौट आई थी.

यह ख़बर महल और प्रजा में आग की तरह फैल गई. राज्‍यभर की खुशि‍यां लौट आई थीं.
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सोमवार, 23 मार्च 2015

(लघुकथा) आटा



सड़क कि‍नारे उसके पास थोड़ी सी ज़मीन थी. उसी पर कुछ अपनी खेती, कुछ खेती बटाई पर लेकर परि‍वार का पेट पाल रहा था. फसल के दि‍नों पूरा परि‍वार जुटकर मेहनत करता. फि‍र फसल का इंतज़ार और अपनी गाय की सेवा.

एक दि‍न गांव में एक लाला जी आए और समझा-बुझाकर उससे ज़मीन खरीद ली. उस ज़मीन पर गेट-चारदीवारी बनाकर एक शैड सा डाल दि‍या. वह गांव के बाहर, ज़मींदार जी के अहाते में कि‍राए पर रहने लगा. बेटे को मोटर साइकि‍ल ले दी. सबने नए-नए कपड़े सि‍लाए, औरतों के लि‍ए पहली बार गहने भी आए. सूमो गाड़ी करके सब रि‍श्‍तेदारों के यहां घूमे. जो पैसा बचा रहा उसे बैंक में जमा कर दि‍या. लाला जी ने उसे चौकीदार रख लिया और बड़े बेटे को मज़दूरी पर. घर के बाकी लोग भी लाला जी की फैक्‍ट्री से माल घर ले जाते और उस पर छोटा मोटा काम करके लौटा देते, उन्‍हें भी चार पैसे मि‍ल जाते. थैली में आटा-दाल ला कर खाते और सो रहते. जब कभी लाइट न होती या कभी ऑर्डर न होते, या फि‍र लाला जी ही नहीं होते तो काम बंद रहता. दि‍हाड़ी भी उसी हि‍साब से कट जाती. एक दि‍न पता चला कि‍ लाला जी ने काम बंद कर दि‍या क्‍योंकि‍ काम ठीक नहीं चल रहा था और सरकारी टैक्‍स की रि‍यायत भी ख़त्‍म हो गई थी.

उस शाम जब वह आटा ख़रीदने दुकान पर गया तो उसने फि‍र रेडि‍यो पर सुना कि‍ कि‍सी और कि‍सान के अात्‍महत्‍या कर लेने की ख़बर आ रही थी. 
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शुक्रवार, 20 मार्च 2015

(लघुकथा) मॉडल






वह एक आम लड़की थी. अपनी सीधी-सादी ज़िंदगी चुपचाप जी रही थी. बि‍ना कि‍सी ख़ास शि‍कायत या उम्‍मीद के. हालांकि‍ उसे इस बात का एहसास था कि‍ उसके पास सोशल सर्कल नहीं है. पर उसने बचपन से ही, इस बारे में न कभी कोई ख़ास कोशि‍श की, न ही कभी परवाह. दूसरों की बातों से भी उसे कभी कोई ख़ास मतलब नहीं रहा लेकि‍न हां, पर्सनल कमेंट उसे अच्‍छे नहीं लगते थे. या तो, वह उन पर रि‍एक्‍ट नहीं करती थी या फि‍र मुंह बना कर नि‍कल जाती.

एक बार कहीं, कि‍सी मॉडल को-ऑर्डि‍नेटर की नज़र उस पर पड़ी. उसने, उसे रैम्‍प पर मॉडलिंग का ऑफर दि‍या तो पल भर में पूरी ज़िंदगी उसकी ऑंखों के सामने से फ़्लैक बैक की तरह गुज़र गई. उसने ट्रेनिंग ली. ट्रेनिंग में उसके साथ उसी के जैसी और भी बहुत सी लड़कि‍यां, पहली बार ट्रेनिंग ले रही थीं. शो हुआ. वह भी रैम्‍प पर इठला और इतरा कर चली. कैमरों के फ़्लैश चमकते रहे, तालि‍यां बजीं. शो खत्‍म हुआ. उसके पांव ज़मीं पर न थे. उसे कल सुबह के अख़बारों में शो की फ़ोटो और ख़बरों से ग्‍लैमर की दुनि‍या में, एक छोटे शहर से आकर छा जाने वाली लड़की साफ दि‍खाई दे रही थी. खुशी के मारे उसे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह के अंग्रेज़ी अख़बार में फ़ैशन शो पर रपट थी ‘फ़ैशन अब केवल खूबसूरत लड़कि‍यों के लि‍ए ही नहीं है.’ अब कमरे से नि‍कलने की उसकी हि‍म्‍मत नहीं हो रही थी. वह कहीं, कि‍सी ऐसी जगह छुप जाना चाहती थी जहां कोई उसे ढूंढ न सके, देख न सके.
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

(लघुकथा) पगड़ी



वह परि‍वार का इकलौता बच्‍चा था. शहर में पला बढ़ा. शहर में ही रहा. पर उसके पि‍ता गांव से आ कर शहर बसे थे. अब उसका वि‍वाह था, वह भी शहर में. यार दोस्‍त, सगे संबंधी लगभग सभी शहरी.  शादी में, सभी ने एक जैसी पगड़ीनुमा टोपि‍यां लगाईं. देखने में पगड़ी, पहनने में टोपी. कभी भी पहनो, कभी भी उतार दो. वि‍वाह के बाद वह धीरे-धीरे अपने जीवन में रंग गया.

एक दि‍न उसके पि‍ता जी चल बसे. परि‍वार फि‍र जुड़ा. संस्‍कार हुए. अब, एक मंदि‍र में रस्‍म-पगड़ी तय की गई. गांव से आए चाचा ने उसे बाजार से लाने वाली चीज़ों की लि‍स्‍ट बनवा दी. वह टैंट वाले के यहां पहुंचा और लि‍स्‍ट थमा दी 150 कुर्सी, 6 बड़ी टेबल, 2 छोटी टेबल, 50 गद्दे-चद्दर, 10 चद्दर, 10 बड़े पंखे, एक कॉफ़ी मशीन, 300 डोने, 500 पानी के गि‍लास, 7 वेटर, एक पगड़ी रस्‍म-पगड़ी वाली...



टैंट वाले के पास, रस्‍म वाली पगड़ी की मांग पहली बार आई थी. वह कुछ समझ नहीं पा रहा था.


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