मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

(लघुकथा) उड़ान




एक दि‍न, कभी न खुलने वाली एक खि‍ड़की के बाहर पक्षि‍यों का एक जोड़ा आ कर बैठा. ति‍नका ति‍नका ला कर एक घोंसला बनाया उन्‍होंने, फि‍र उसमें दो अंडे दि‍ए. दोनों बारी बारी से उन अंडों को सेते. एक दि‍न उन अंडों से दो छोटे-छोटे बहुत सुंदर जीवन नि‍कले. अब वे बारी बारी से उनके लि‍ए कुछ-कुछ ला कर खाने को देते. बच्‍चे तेज़ी से बढ़ने लगे. दोनों पक्षी मि‍ल कर उन्‍हें उड़ना सि‍खाते. बच्‍चे पंख फड़फड़ाते पर उड़ न पाते. लेकि‍न एक दि‍न, बच्‍चों ने अपने पंख तौले और उड़ान पर नि‍कल गए. फि‍र वे कभी नहीं लौटे. धीरे-धीरे घोंसले के ति‍नके बि‍खरने लगे...


खि‍ड़की के इधर, अरसे से ये सब देख रहीं बूढ़ी नम ऑंखों ने आज बड़ी लम्‍बी और गहरी सॉंस ली और फि‍र हौले से बंद हो गईं.
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