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मंगलवार, 1 सितंबर 2015

(लघुकथा) शि‍क्षा

दूर कहीं कि‍सी देश में एक गांव था, दीन-दुनि‍या की बातों से अछूता. गांव, बाहर की दुनि‍या से एकदम कटा हुआ था. ऊपर खुला आसमान और नीचे हरी धरती ही गांव वालों की दुनि‍या थे.  गांव में हर तरह के लोग थे. अलग-अलग धर्मों से मि‍लते-जुलते से उनके तरह-तरह के वि‍श्‍वास थे. अपनी ज़रूरत की सभी चीज़े वे ख़ुद ही उगा लेते थे. सब मि‍लजुल कर रहते थे. गांव में कोई भी पढ़ा-लि‍खा इन्‍सान नहीं था. वे हर बात के लि‍ए गांव के एक सबसे बूढ़े आदमी से सलाह लेते और उसकी बात मानते. जब कभी कोई मुसाफि‍र उस गांव से गुजरता, गांव वाले उसे घेर लेते कि‍ वो कोई नई बात बताएगा, नई चीज़ें दि‍खाएगा. 

एक दि‍न गांव में, बाहर के कुछ लोग आकर ज़मीन की नपाई करने लगे तो गांव वालों ने कारण पूछा. उन्‍होंने बताया कि‍ सरकार ने फ़ैसला कि‍या है कि‍ उनके गांव में स्‍कूल बनाया जाएगा. गांव वालों ने जाकर यह बात खुशी-खुशी उस सबसे बूढ़े आदमी को बताई. यह बात सुन कर वह उदास हो गया और तब से चुप-चुप सा रहने लगा. एक दि‍न गांव वालों ने पूछा कि‍ बाबा तुम अब उदास क्‍यों रहते हो.

उसने कहा –‘मेरे बच्‍चो, अब तुम लोग मि‍लजुल कर नहीं रह पाओगे.’ इतना कह कर वह उठा और खेतों की ओर नि‍कल गया.
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बुधवार, 25 जून 2014

(लघुकथा ) बड़े लोग



मेरे पड़ोसी का बेटा बचपन से ही बड़ा आदमी बनने के ख़्वाब देखा करता था. उसकी चाह पूरी होती भी दि‍खने लगी जब पढ़ाई-लि‍खाई में उसकी कोई रूचि‍ न रही, लेकि‍न बातों का पहलवान नि‍कला. और आख़ि‍र वो एक दि‍न भी आ ही गया जब ‘सीधे बारहवीं करें’ टाइप एक कॉलेज से उसके लि‍ए  स्‍नातक की डि‍ग्री जुटा ली गई. पि‍ता ने एक वकील दोस्‍त की नि‍गेहबानी में समाजसेवा के लि‍ए उसे एक एन. जी. ओ. खुलवा दी. बाक़ायदा बोर्ड लगाया गया. ख़र्चे की स्कीम बना ली गई. हर तरह के रजि‍स्‍टर और वाउचर भी तैयार कर लि‍ए, बस पैसे आने का ही मसला कुछ बन नहीं रहा था.

पर उस शाम, उनके घर जश्‍न का सा माहौल था. बाक़ायदा कुछ सेलि‍ब्रेशन सा चल रहा था. घर में कई लोग आए हुए थे. हल्के संगीत पर खाना-पीना हो रहा था. बीच-बीच में, ठहाकों की भी आवाज़ बाहर तक आ रही थी. घर के बाहर कई गाड़ि‍यां पार्क थीं. 

मैंने घर में घुसते हुए पत्‍नी से पूछा –‘तो इनके बेटे का रि‍श्‍ता हो गया क्‍या ? लड़की वाले कौन लोग हैं जी ?’

‘नहीं जी. उसकी मां बता रही थी कि‍ एन. जी. ओ. के लि‍ए ग्रांट मि‍लने की बात आज फ़ायनल हो गई है.’ – कहते हुए पत्‍नी रसोई में चली गई.
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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

(लघु कथा) मौनी बाबा की जय

 
क किसी काम का आदमी नहीं था. ऐसा उसे घर से लेकर बाहर तक, गांव भर के सभी लोगों ने बताया था. उसे भी पक्का विश्वास हो गया था कि इतने लोग ग़लत नहीं हो सकते. उसने मान लिया था कि वह किसी काम का न था.

एक दिन वह सोचने लगा कि जब वह किसी काम का आदमी नहीं है तो उसे क्या करना  चाहिये. उसे कुछ समझ नहीं आया. उसने सुना था कि यदि आलथी-पालथी मारकर, दोनों हाथ घुटनों पर रखकर, आंखें बंद करके बैठ कुछ सोचा जाए तो अच्छा रहता है. उसके बाल-दाढ़ी बढ़े रहते थे. वह यूं ही रहता था. पर, आज उसने कपड़े धोकर सूखने डाल रखे थे इसलिए एक गमछा टांग वह टहल लिया. यहां वहां आसपास कुछ शोर सा था. सो, वह ज़रा दूर अकेले में एक पेड़ के नीचे ठीक इसी मुद्रा में सोचने के लिए जा बैठा. बैठे-बैठे उसे नींद आ गई पर चांस की बात कि वह इधर-उधर लुढ़का नहीं. पता नहीं वह कब तक सोता रहा.

जब उसकी आंख खुली तो उसने देखा कि बहुत से भक्त लोग कुछ कुछ माल-मत्ता उसके आगे रक्खे बैठे हैं. उसकी आंख खुलते ही उन्होंने नारे लगाए - "मौनी बाबा की जय, मौनी बाबा की जय." तब से उसने सोचने के साथ-साथ बोलना भी छोड़ दिया और गांव बदल लिया.
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