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शनिवार, 1 अगस्त 2015

(लघुकथा) थप्‍पड़



वह बहुत बड़ा लीडर था. और यह, उस लीडर के मातहत एक छोटा सा मुलाजि‍म. लीडर एक दि‍न इस मुलाजि‍म के यहां दौरे पर आया. साथ चल रहे लोगों पर रौब गांठने की गर्ज़ से, कुछ बहाना बना कर उसने मातहत को एक थप्‍पड़ जड़ दि‍या. मातहत ने केस दर्ज़ करा दि‍या. मामला चलता रहा. साल-महीने बीतते रहे.

एक दि‍न, जब अदालत में केस के फ़ैसले की घड़ी आई तो लीडर ने मातहत को कई लाख रूपए का हर्ज़ाना देने की पेशकश की. मातहत ने पेशकश ठुकरा दी. लीडर को समझ आ गया कि‍ अब उसका जेल जाना तय था. उसने जज  की तरफ बेबसी से देखा. जज  ने बताया कि‍ कानून के हाथ बंधे हुए हैं, वह दोषी साबि‍त हुआ है, अब बस एक ही चारा है, यदि‍ मातहत समझौते के तहत उसे माफ़ कर दे तो वह जेल जाने से बच सकता है. लीडर ने मातहत की ओर देखा, पर वह जज  की ओर देख रहा था. जज ने मातहत से पूछा तो मातहत ने कहा कि‍ यदि‍ उसे भी, लीडर को एक थप्‍पड़ मारने दि‍या जाए तो वह उसे माफ़ कर सकता है. जज ने लीडर की ओर देखा. वह जेल नहीं जाना चाहता था. उसने अपने वकील की ओर देखा. वकील ने कुछ नहीं कहा. लीडर ने जज की तरफ देख कर हामी में सि‍र हि‍ला दि‍या और फि‍र वह नीचे की ओर देखने लगा. जज ने मातहत की ओर इशारा कर थप्‍पड़ मारने की इजाज़त दे दी. 

वह धीरे-धीरे लीडर की ओर बढ़ा और उसके पास जाकर रुक गया. लीडर ने ज़ोर से आंखें भींच लीं. मातहत ने थप्‍पड़ मारने के बजाय कहा –‘तुम्‍हारे लि‍ए बस इतना ही काफी है. मैं तुम जि‍तना नहीं गि‍र सकता. मैंने तुम्‍हें माफ़ कि‍या.’     

फि‍र वह घूमा, जज साहब को झुक कर नमस्‍ते की और कोर्ट से बाहर नि‍कल गया.
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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

(लघुकथा) एक था गधा



एक जंगल था, स्‍याह जंगल. जंगल में एक हाथ को दूसरा हाथ दि‍खाई नहीं देता था. उस जंगल में एक सि‍यार था और एक था गधा. गधा सि‍यार से कहीं अधि‍क बड़ा और बलशाली था, पर था तो गधा ही इसलि‍ए सि‍यार ने उसे अपने प्रश्रय में रखा हुआ था. सि‍यार मॉंस खाता और गधा खाता घास. एक दि‍न, सि‍यार को घास में भी स्‍वाद आ गया और वह घास भी खाने लगा. यहां तक कि‍ वह गधे के हि‍स्से का भी सारा जंगल खा गया. गधा रात को लेटा तो उसने फ़ैसला कि‍या कि‍ वह सुबह सि‍यार को ढूंढ कर दुलत्‍ती मार वि‍दा कर देगा उस जंगल से. उस रात गधा भूखा सोया.

सुबह सि‍यार उसे ढूंढता आया और बोला – ‘मुझे पता चला कि‍ कल रात तू भूखा सोया ? ओह, बड़ा बुरा हुआ. ख़ैर कोई बात नहीं, तू मेरे साथ आ, मैं तुझे दि‍खाउंगा कि खाने के लि‍ए‍ घास कैसे उगता है.’

गधा तो गधा ठहरा, मान गया और फि‍र पेट पर पत्‍थर रख सि‍यार के प्रश्रय में हो लि‍या, एक बार फि‍र घास उगने की उम्‍मीद में. उस जंगल में भी घास पॉंच साल में एक ही बार उगता था.
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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) निरर्थक


कल तक की मध्यवर्गीय कॉलोनी में एक बहुत बड़े घर के बाहर आपने लॉन में  एक आदमी आरामकुर्सी पर बैठा हुआ सुबह का अख़बार पढ़ रहा था. वहीं पास ही उसकी चमचमाती कार खड़ी थी. इलाके के नेता जी ने उधर से गुजरते हुए प्रश्नवाचक मुद्रा में अपने पिछलग्गू की ओर देखा. उसने हामी में सिर हिलाया और नेता जी को बताना शुरू किया -''साहेब, लोगों के काम-धंधे अच्छे चल रहे हैं, इनके बच्चे बड़े अंग्रेज़ी स्कूलों में जाते हैं. यहां की सड़कें शीशे जैसी बन गई हैं. पीने के पानी और सीवर की पाइपलाइन अलग कर दी गई हैं. नलों में मिनरल वॉटर आता है, हर मोहल्ले में फ़्री प्राइवेट अस्पताल हैं. इनके गांवों में अब किसान भी आत्हत्याएं नहीं करते. बिजली 24 धंटे आती है. शहर में अपराध नहीं के बराबार होते हैं, पुलिस भी सभी केस दर्ज़ करके तुरंत कार्रवाई करती है.  दफ़्तरों में बाउ लोग बिना पैसा मांगे काम करने लगे हैं …''

''बस बस बस...'' - चिल्लाते हुए नेता जी की नींद खुल गई. पत्नी ने पूछा कि क्या हुआ कोई बुरा सपना देखा

नेता जी की जान में जान आई -'' हां, भागवान कितना भयंकर सपना था, मैंने देखा कि मेरी तो ज़रूरत ही नहीं रह गई थी.'' कह कर चैन की सांस ले नेता जी फिर ऊंघने लगे.
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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) बजट


नेता-वि‍पक्ष पर गाज गि‍री तो उन्‍हें अपने पद से स्‍तीफा देना पड़ा. अब नए की ढूंढ मची. जहां एक तरफ हर कोई खींचतान करने लगा तो वहीं दूसरी तरफ हर कोई धोती नुचैया भी होने लगा. नादि‍रशाही से डरी हाई कमान ने एक भौंदू नेता ढूंढा और उसके भागों छीका तोड़ उसे नि‍र्वि‍वाद नेता-वि‍पक्ष नि‍र्वाचि‍त करवा दि‍या. पर सि‍र मुंडाते ही ओले पड़े, पता चला कि‍ उसी दि‍न तो बजट पेश होने वाला था. ‘और कुछ हो न हो, अखबार-टी.वी. वाले ज़रूर पूछेंगे कि‍ आपकी नज़र में बजट कैसा रहा’- नेता ने सोचा.

नेता जी ने पी.एस. को पकड़ा और उसे बाथरूम में ले गए, धीरे से फुसफुसाए कि‍ गुरू बताओ ऐसे में मैं क्‍या करूंगा. पी.एस. सीज़न्‍ड था उसने बताया –‘सर, बजट तीन तरह का होता है. अच्‍छा, बुरा या न्‍यूट्रल. अगर बजट अच्‍छा हुआ तो आप कहना ये महँगाई बढ़ाने वाला बजट है जि‍से अगले चुनाव ध्‍यान में रख कर बनाया गया है. अगर बजट बुरा हुआ तो कहना कि‍ यह बजट आम आदमी वि‍रोधी तो है ही इससे वि‍कास भी अवरूद्ध हो जाएगा. और अगर बजट न्‍यूट्रल हुआ तो कहना कि‍ बजट में आम आदमी के लि‍ए कुछ भी नहीं है यह वि‍देशी दबाव में बनाया गया बजट है.’

नेता जी याद करने की मुद्रा में सोचने लगे तो पी.एस. ने ढाढस बंधवाया –‘सर, अगर आप जवाब देते हुए भूल जाएं कि‍ कि‍स तरह के बजट के लि‍ए कि‍स तरह का जवाब देना है तो, आप इनमें से कोई भी जवाब दे दीजि‍ए कुछ फ़र्क नहीं पडेगा, कोई भी जवाब कि‍सी भी तरह के बजट के साथ फ़ि‍ट हो सकता है. आजतक ऐसा ही होता आया है.’ फि‍र दोनों ने खीस नि‍पोर दी.
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सोमवार, 27 अगस्त 2012

(लघुकथा) अथकथा राजनीति‍



एक देश था. देश में लोकतंत्र था. उस देश में दो राजनीति‍क पार्टि‍यां थीं.

जो पार्टी सत्‍ता में थी, उसके पास लीडर नहीं था इसलि‍ए उसके लोग लीडर खोजते रहते थे.

जो पार्टी वि‍पक्ष में थी, लीडर उसके पास भी नहीं था. वे भी लीडर खोजते रहते थे क्‍योंकि‍ उनके यहां जो लीडरी के क़बि‍ल था उसे वे लीडर बनने ही नहीं देना चाहते थे.
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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

(लघु कथा) विकास योजना

आने वाले चुनावों के लिए पार्टी प्रत्याशियों की सूचि जारी होनी थी. सर्किट हाउस के बाहर, टिकटों के अभिलाषी अपने-अपने समर्थकों के साथ पूरा लाव-लश्कर लिए जमा थे, भले ही टिकट ग़िनती की ही होती हों. बाज़ार गर्म था कि इस बार चुनाव प्रत्याशियों के नाम घोषित होते ही बाहर घल्लू-घारा की सी स्थति हो जाएगी, जिन्हें टिकट नहीं मिलेंगी वे ग़जब की तोड़-फोड़ करेंगे.  कुछ भी हो सकता है.

अंदर सलाह हुई. रणनीति बनी. टिकट की उम्मीद लगाए बैठे सभी पार्टी वर्करों को राज्यप्रभारी ने अकेले में बुला कर समझाया -" आप लोगों के लिए गांवों में ही अब इतनी स्कीमें चला दी हैं हमने कि असेंबली के चुनावों में वो बात नहीं रही. गांवों की पंचायतों में रहो  और इन स्कीमों को ठीक से चलाओ. समझ रहे हो न मैं क्या कह रहा हूं ?"

बात सबके समझ आ गई और वे अपने-अपने समर्थकों को लेकर खुशी-खुशी लौट गए.
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