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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

(लघु कथा) बकरि‍याँ


एक गाँव था. उस गाँव में बहुत सी बकरि‍याँ थीं. ज़्यादातर बकरि‍याँ गँवार थीं. और जहाँ देखो वहीं मुँह मारती रहती थीं वे बकरि‍याँ. मुँह मारने की दौड़ में, वे आपस में बारी-बारी एक-दूसरे से अपना-अपना हक़ भी माँगा करती थीं. आमतौर से एक-दूसरे की बात मान लेती थीं वे बकरि‍याँ पर, जो कभी कि‍सी धड़े ने बात न मानी और बारी फलॉंग कर फि‍र कहीं मोटा बुटका भर लि‍या तो दूसरि‍यों को ग़ज़ब के मरोड़ उठते थे. पूरा गॉंव वो सि‍र पर ऐसे उठा लेती थीं कि‍ सारा-सारा गॉंव खाए की जुगाली तक करना भूल जाता था.

एक दि‍न फि‍र वही दंगा हुआ. दूसरे धड़े ने, पहले धड़े की बड़ी बकरी पकड़ ली और उसे घेर कर माल उगलने को कहा. पर वो बड़ी बकरी भी कमाल की काइयॉं थी. उसने भी जवाब में मेंमें-मेंमें कर दी, जब तक दूसरे धड़े की बकरि‍याँ मेंमें-मेंमें का मतलब समझतीं, वो चलती भी बनी.

बाद में पता चला कि‍ उसने तो मेंमें-मेंमें भी नहीं की थी बल्‍कि‍ वो तो जाते-जाते एक शेर सुना गई थी.
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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

(लघु कथा) कहानी एक और राजे की



एक बहुत बड़े देश में एक राजा था. राजा निरंकुश था. अपने राज में वह अपनी मनमानी करता था. किसी से नहीं डरता था. उसके सेनापति को उसकी गतिविधियों की जानकारी न होने का भ्रम सदा ही बनाए रखा जाता था, कम से कम देश को तो यही लगता था. देश की प्रजा अपने-अपने काम धंधों में लगी रहते थी और निर्विकार भाव से देश के लिए धनोपार्जन करती रहती थी.

उसी देश में एक स्वामी जी भी रहते थे. स्वामी जी राजा की तुलना में प्रकांड ज्ञानी थे. स्वामी जी को राजा का यूं राज करना फूटी आंख न सुहाता था क्योंकि दोनों ही देश के एक ही क्षेत्र से थे पर एक राजा दूसरा रंक. एक दिन स्वामी जी ने राजा को गिराने की भीष्मप्रतिज्ञा के साथ चाणक्य की ही तरह जटा खोली और राजा की जड़ों में मट्ठा डालने में जुट गए. और भाग्य का खेल देखिए, वही हुआ, स्वामी जी ने भी ठीक चाणक्य की ही तरह अपने प्रयासों में सफलता पाई और राजा को नंद वंश की ही तरह जड़-मूले से उखाड़ फेंका. इसके बाद का लिखित इतिहास नहीं मिलता है कि मौर्यवंश की ही भांति किसी सम्राट अशोक की प्रतिस्थापना उस देश में हो पाई या नहीं. देश की प्रजा पहले ही तरह अपने-अपने काम धंधों में लगी रह कर निर्विकार भाव से देश के लिए धनोपार्जन करती रही.
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