शनिवार, 4 अगस्त 2012

(लघुकथा) परि‍णति‍


एक गाँव में एक सीधा सा ईमानदार बूढ़ा आदमी रहता था. आत्‍मा के जीवन-यापन के लि‍ए वो आए दि‍न, शहरों में जा कर अनशन करता रहता था. एक दि‍न, मार्केटिंग वाले कुछ लोगों की नज़र उस पर पड़ी तो वे खुद तो उसके चेले हो ही लि‍ए, ढेरों दूसरे चेले भी जुटा लाए.

एक बार अनशन के तय दि‍न बाबा को कुछ काम आ पड़ा. चेलों ने बाबा को कॉपी करने की ज़ि‍द की, बाबा ने भी हामी भर दी. लेकि‍न जोश-जोश में चेले, जब अनशन को आमरण-अनशन घोषि‍त करके फॅस गए तो उन्‍हें समझ आया कि‍ ये तो बड़ा मुश्‍कि‍ल काम है. उन्होंने बाबा को बर्गलाया, कि‍ चलो ये हठयोग छोड़ कर कोई दूसरा आसान सा धन्‍धा करते हैं. उन्‍होंने एक राजनैति‍क पार्टी बना दी. अब, बाबा उनके पीछे-पीछे पगलाया सा गली-गली वोट मॉंगता घूमता रहता है, बुढ़ापे में. 
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