बुधवार, 20 मार्च 2013

(लघुकथा) एफ़. आई. आर.

एक नेता जी टहलते हुए उधर से नि‍कल रहे थे कि मजमा सा लगा देख ठि‍ठक गए. दूर से उन्‍हें लगा कि बहुत से वकील लोग कि‍सी को घेरे हुए हैं. उनकी उत्‍सुकता और बढ़ गई. सोचा, कहीं फि‍र कोर्ट-कचेहरी की हड़ताल तो नहीं ! पर ऐसा कुछ सुना तो नहीं था. सो, उधर को ही हो लि‍ए कि चलो देखें तो सही, माजरा क्‍या है.

वहां पहुंचते ही उनकी आओ जी, आओ जीहोने लगी. उन्‍होंने देखा कि भीड़ के बीच कुछ जज साहेबान भी खड़े थे. और उन सबके बीच खड़ा था एक पुलि‍सवाला. सबने मि‍लकर नेता जी को भी पुलि‍सवाले के बगल में खड़ा कर दि‍या. और फि‍र कि‍सी ने माइक पर भाषण शुरू कि‍या –‘भाइयो और बहनो, जब भी कि‍सी कानून की बात चलती है तो उस मुद्दे से जुड़ी कानूनी कि‍ताबें पढ़ते-पढ़ते हम हलकान हो जाते हैं. पर धन्‍य है हमारी ये कानून फ़ैक्‍ट्री जो बि‍ना रूके रोज़ नए-नए कानून बनाती जाती है.कहते हुए उसने नेता जी की ओर इशारा कि‍या. नेता जी की बत्‍तीसी दि‍खने की देर थी, तालि‍यां ही तालि‍यां पि‍टीं.

भाषण चालू था - कभी, कहीं, कोई भी अपराध हो तो क्‍या मज़ाल कि एफ़. आई. आर. लि‍खने से पहले ये हवलदार जी सोचने के लि‍ए पलक भी झपकें कि उस अपराध पर कि‍स कानून की कौन सी धारा लगेगी. कानून और धारा खटाक से लगा देते हैं. तो आइए, इन दोनों महानुभावों के सार्वजनि‍क सम्मान समारोह को सफल बनाएं.उसके बाद, नेता जी और पुलि‍सवाले को दे दनादन मालाएं पहनाई जाने लगीं.
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