शनिवार, 9 मार्च 2013

(लघुकथा) और जा

उसके घरवाले कुछ समय से देख रहे थे कि‍ शहर में अपराधों की बढ़ती ख़बरें सुन और देख कर वह बहुत वि‍चलि‍त हो जाता. जैसे ही कोई इस तरह की ख़बर टी0 वी0 पर आती तो वह चैनल बदल देता. और कई बार तो घर की घंटी बजने पर, वह घर में होते हुए भी कहलवा देता -‍ कह दो कि‍ मैं घर पर नहीं हूं. फ़ोन की घंटी बजने पर भी वह आशंकि‍त हो उठता और आमतौर से फ़ोन पर बात करने से भी कतराता. वह पहले ऐसा नहीं था. बल्‍कि‍ अभी हाल ही में, अपराध के वि‍रूद्ध हुए एक जनव्‍यापी आंदोलन में तो उसने बढ़-चढ़ कर हि‍स्‍सा लि‍या था और रि‍ले भूख हड़ताल पर भी बैठा था.

एक दि‍न उसकी चिंति‍त मां ने प्‍यार से पूछा -बेटा क्‍या बात है, परेशान सा क्‍यों रहता है और आजकल धरने प्रदर्शनों में भी नहीं जाता?’
 
तुभ भी क्‍या बात करती हो मॉं. अपना कोई काम-धंधा भी देखूं या नहीं... जि‍से देखो वही मुंह उठा कर चला आता है बुलाने कि‍ चलो वहां नारे लगाने हैं. यार दोस्‍तों ने तो मोमबत्‍तीवाला बाउ के नाम से पुकारना शुरू कर दि‍या है...- कहता हुआ वह ज़ोर से दरवाज़ा भड़भड़ा कर बाहर चला गया.
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