रविवार, 21 अप्रैल 2013

(लघुकथा) बिंदु



एक स्‍वामी जी थे. एक दि‍न वे एक बस्‍ती में गए और लोगों को संबोधि‍त करते हुए बोले, मैं तुम्‍हें एक काम दे कर जा रहा हूं, मुझे इसका मतलब बताना. उसके बाद स्‍वामी जी ने दीवार पर एक नि‍शान बनाया और चले गए.

सब अपने-अपने हि‍साब से उसका मतलब बताने लगे. कि‍सी ने कहा कि यह नक्षत्र है तो कि‍सी ने कहा कि तारा है, कि‍सी ने उसे सूरज कहा तो कि‍सी ने ब्रह्मांड. कि‍सी ने सृष्‍टि का आदि तो कि‍सी ने सृष्‍टि का अंत. और सब बहस करते रहे.

कुछ समय बाद स्‍वामी जी लौटे और सब की उपस्‍थि‍ति में एक बच्‍चे को बुला कर पूछा कि बेटा ये क्‍या है. बच्‍चे ने कहा –‘यह एक बिंदु है बाबा.’

स्‍वामी जी ने कहा –‘और तुम लोगों ने इ‍तनी सीधी सी बात के क्‍या क्‍या मतलब नि‍काल डाले. जीवन भी इतना ही सरल है पर तुम हो कि उसे क्लि‍ष्‍ट बनाए बैठे हो.’

00000