गुरुवार, 2 मई 2013

(लघुकथा) ड्राइवर


वह इधर-उधर फुटकर ड्राइवरी करते-करते उकता सा गया था. हर दि‍न नया काम खोजना, अनजान लोगों को, अलग-अलग गाड़ि‍यों में अनजान जगहों पर ले जाना अब उसे कुछ असहज सा लगने लगा था. फि‍र, कि‍सी-कि‍सी दि‍न काम मि‍लता भी नहीं था.

उसने एक अख़बार में वि‍ज्ञापन पढ़ा, मर्सि‍डीज़ कार चलाने के लि‍ए अनुभवी ड्राइवर की आवश्‍यकता है. वह धुले हुए कपड़े पहन कर बात करने चल दि‍या. कोठी के बाहर एक नई मर्सि‍डीज़ खड़ी थी, शायद उसी के लि‍ए वि‍ज्ञापन था. सारी बातचीत ठीक ठाक ही हो गई. अंत में लाला ने कहा कि मैं जब भी गाड़ी में बैठने के लि‍ए आऊं तो कार का दरवाज़ा खोलने के लि‍ए उसे भागकर आना होगा. उसने कहा कि सर, डोर खोलने के लि‍ए मैं हमेशा आपके कार तक पहुंचने से पहले ही वहां रहूंगा. लाला ने कहा कि नहीं, मैं चाहता हूं कि तुम हमेशा भाग कर ही मेरे लि‍ए दरवाज़ा खोलो. उसने कुछ पल सोचा. फि‍र उठते हुए बोला कि अच्‍छा सर मैं घरवालों से भी बात करके आपको बताता हूं. और नमस्‍ते कर वह बाहर नि‍कल आया.

अब अगले दि‍न से रोज़ नया काम खोजना, अनजान लोगों को, अलग-अलग गाड़ि‍यों में अनजान जगहों पर ले जाना उसे अच्‍छा लगने लगा था.
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