गुरुवार, 20 जून 2013

(लघुकथा) मां



उनका भरा-पूरा छोटा-सा खुशहाल परि‍वार था, पति‍-पत्‍नी बि‍टि‍या और मां. वह एक मल्‍टीनेशनल में बड़ी सी नौकरी करता था. कंपनी ने तीन बैडरूम वाला फ़्लैट दे रखा था. पत्‍नी भी नौकरी करती थी पर बि‍टि‍या के जन्‍म के बाद से उसने नौकरी छोड़ दी थी. बि‍टि‍या सबकी बहुत लाड़ली थी उसने ज़ि‍द की कि‍ उसे एक कुत्‍ता चाहि‍ए. उसने समझाया तो सही पर मां-बेटी एक तरफ हो लीं. पत्‍नी ने भी सि‍फ़ारि‍श की –‘बच्‍ची की बात मान लो ना, कुत्‍ता रखने का मेरा भी बहुत मन है.'


हफ़्ते भर बाद, आखि‍र वे एक डॉग-डीलर के यहां चले ही गए. जो कुत्‍ता उन्‍हें पसंद आया, उसमें दि‍क़्कत ये थी कि‍ उस नस्‍ल के कुत्‍ते को अलग कमरा चाहि‍ए होता है. एक कमरा पति‍-पत्‍नी के पास था, तो एक-एक दादी और पोती के पास. ड्राइंग रूम में कुत्‍ता रखा नहीं जा सकता था. उनकी दुवि‍धा देख मां ने कहा –‘बेटा, शहर में रहते-रहते मेरा जी भर गया है, मैं गांव जाने की कहना ही चाह रही थी. बहू-बेटे ने खूब ना-नुकर की नहीं मां, हम तुमसे कमरा कैसे खाली करवा सकते हैं.लेकि‍न मां ने भी कुछ तर्क दि‍ए. कुत्‍ता बाद में लेने की बात कह कर वे घर चल दि‍ए.

मां के एक बार फि‍र कहने पर घर लौटते हुए रास्‍ते में, उसने मां के लि‍ए गांव की रेल-टि‍कट बुक करवा दी.
 

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