शनिवार, 2 नवंबर 2013

(लघुकथा) शहर


वे प्रकृति के चि‍तेरे रहे.‍ प्रकृति चित्रण करते करते सत्‍तर बसंत कब उन्‍हें लॉंघ गए पता ही न चला. मान-सम्‍मान-पुरस्‍कार सब कुछ मि‍ला उन्‍हें. अगली पीढ़ी ने चि‍त्रकला उनसे वि‍रासत में पाई. पुत्र भी जाना माना चि‍त्रकार है और पोता भी उन्‍हीं के पदचि‍न्‍हों पर चल नि‍कला. उन दोनों के चि‍त्रों में भी प्रकृति ही रंग भरती है.

उन्‍होंने प्रकृति‍ की गोद में बसे एक गांव में जब पहले-पहल ऑंखें खोलीं तो ऊपर बि‍छा असीम नीला आसमान पाया. बस वही उनमें बस गया. उनके हर चि‍त्र का नीला आकाश उनकी पहचान बन गया. एक दि‍न वे शहर आ बसे. बेटा यहीं पला बढ़ा. उसके चि‍त्रों में भी आसमान की छटा देखते ही बनती है. पर वह आसमान, नीला नहीं सलेटी रंगता है.

पर अब वे पोते के बने चि‍त्र देखते हैं तो कुछ दुखी दिखते हैं क्‍योंकि‍ वह आसमान को काले रंग में बनाने लगा है.
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