मंगलवार, 17 जून 2014

(लघुकथा) पि‍ता



वह लंबी नौकरी के बाद रि‍टायर हो गया था. बेटा नालायक नि‍कला. बेटी की उमर बढ़ती जा रही थी पर रि‍श्‍ता कहीं हो नहीं पा रहा था. पत्नी की तबीयत भी कुछ ठीक नही रहती थी. ग़नीमत थी कि‍ नौकरी पेंशन वाली थी, कि‍सी तरह गुजर बसर हो रही थी. पत्‍नी जब देखो तब बेटे को कोसती, बेटी पर ताने कसती और उससे खीझती रहती.
 
वह आज फि‍र दुखी थी –‘आपको क्‍या कहूं. यह नहीं कि‍ कि‍सी को कहलवा कर बेटे को कहीं रखवा देते. मंदि‍रों में माथा टेक-टेक भरपाई मैं, बेटी है कि‍ पहाड़ सी बैठी ही हुई है मेरी छाती पर. पर आपको क्‍या आपके तो कान पर जूं तक नहीं रेंगती. बस मैं ही हूं जो चौबीसों घंटे चिंता में घुलती रहती हूं...’

उसने एक लंबी और गहरी सांस ली -‘उफ़्फ आदमी होना कि‍तना मुश्‍कि‍ल है, वह तो रो भी नहीं सकता.’ बुदबुदाते हुए वह धीरे से बाहर नि‍कल गया. 

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