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शनिवार, 22 अगस्त 2015

(लघुकथा) बेटा



उसकी उमर बहुत हो गई थी. पर फि‍र भी घर के नज़दीक ही एक डॉक्‍टर के छोटे से प्राइवेट क्‍लीनि‍क में सफाई-पोचे का काम करती थी. घर पर कुछ ख़ास काम नहीं होता था सो, सुबह-सवेरे पहुंच जाती, धीरे-धीरे आराम से काम नि‍पटाती, पूरा दि‍न वहीं रहती और फि‍र शाम को ही घर जाती. एक दि‍न सुबह-सुबह क्‍लीनि‍क खुलने से पहले ही एक परि‍वार बदहवास सा क्‍लीनि‍क पहुंचा. मां-बाप की गोद में कुछ महीने का बेटा था. साथ में उनकी बड़ी बेटी भी थी.
 
उन्‍होंने बताया कि‍ डॉक्‍टर साहब से बात हो गई है. वे आते ही होंगे. उनके बेटे को तेज़ बुखार था, वह आंखें नहीं खोल रहा था. उसने काम छोड़ कर उन्‍हें बि‍ठाया और भीतर से गीली पट्टी लाते हुए तसल्‍ली दी कि‍ कोई बात नहीं, चिंता न करो, माथे पर गीली पट्टी रखने से बुखार उतर जाएगा. उन्‍हें इस बात की भी चिंता थी कि‍ बेटी जो बारहवीं में थी, आज उसका स्‍कूल मि‍स नहीं होना चाहि‍ए. तभी डॉक्‍टर साहब भी आ गए. बच्‍चे को चैक कि‍या और कहा कि‍ डरने की कोई बात नहीं है, आइंदा बच्‍चे का बुखार इतना न बढ़ने दें. जैसे ही बुखार बढ़ना शुरू हो, गीली पट्टी से माथा, कांख और पेट पोछें. और कुछ दवाइयां भी लि‍ख कर दीं.

परि‍वार चला गया तो वह वहीं डॉक्‍टर के केबि‍न में साफ-सफाई करते हुए खुद से बोली –‘बेटी और बेटे की उमर में इतना फरक ! रामजाने कि‍तनी बेटि‍यां मारी होंगी.’ डॉक्‍टर ने यूं कंप्‍यूटर ऑन करने का उपक्रम कि‍या कि‍ जैसे उसने कुछ सुना ही न हो.
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मंगलवार, 9 सितंबर 2014

(लघुकथा) व्यवहार



उसने पूरी जिंदगी नौकरी करते हुए गुजार दी. उनके एक बेटा और बेटी थे. बेटा कुछ छोटा-मोटा काम कर रहा था. बेटी की शादी की चिन्ता में पाई-पाई जोड़ते हुए वे सदा घुलते रहे. पैसे बचाने की गरज से हमेशा किराए के मकानों में रहे. आज बेटी की शादी का दिन भी आ ही गया. धीरे-धीरे इकट्ठे किये हुए सामान जुटाए. हैसियत के हिसाब से उधार लिया और जैसे-तैसे शादी निपटा ही दी. पर शादी मेँ ख़र्चा कुछ ज्यादा ही हो गया था.
सबके शादी-व्यवहार में उसने ज़िम्मेदारी सदा निभाई. और अब पत्नी के साथ बैठ, शादी में मिले लिफ़ाफ़े खोलते हुए उसे बार बार यही ख़्याल आ रहा था कि क्या लिफ़ाफ़ों में से इतने रुपए निकलेंगे कि उसका कर्ज़ उतर जाए. तभी उन्हें एक मोटा सा लिफ़ाफ़ा दिखाई दिया. उलट-पलट कर देखा, उस पर किसी का नाम नहीं था. खोल कर देखा तो उसमें काफी रुपए थे. उन्होंने ध्यान से देखा, रुपयों से भरे ऐसे ही कुछ और अनाम लिफ़ाफ़े अभी भी खोलने बाक़ी थे.

उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था. उनकी आंखें बस डबडबाई हुईं थीं.
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मंगलवार, 17 जून 2014

(लघुकथा) पि‍ता



वह लंबी नौकरी के बाद रि‍टायर हो गया था. बेटा नालायक नि‍कला. बेटी की उमर बढ़ती जा रही थी पर रि‍श्‍ता कहीं हो नहीं पा रहा था. पत्नी की तबीयत भी कुछ ठीक नही रहती थी. ग़नीमत थी कि‍ नौकरी पेंशन वाली थी, कि‍सी तरह गुजर बसर हो रही थी. पत्‍नी जब देखो तब बेटे को कोसती, बेटी पर ताने कसती और उससे खीझती रहती.
 
वह आज फि‍र दुखी थी –‘आपको क्‍या कहूं. यह नहीं कि‍ कि‍सी को कहलवा कर बेटे को कहीं रखवा देते. मंदि‍रों में माथा टेक-टेक भरपाई मैं, बेटी है कि‍ पहाड़ सी बैठी ही हुई है मेरी छाती पर. पर आपको क्‍या आपके तो कान पर जूं तक नहीं रेंगती. बस मैं ही हूं जो चौबीसों घंटे चिंता में घुलती रहती हूं...’

उसने एक लंबी और गहरी सांस ली -‘उफ़्फ आदमी होना कि‍तना मुश्‍कि‍ल है, वह तो रो भी नहीं सकता.’ बुदबुदाते हुए वह धीरे से बाहर नि‍कल गया. 

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