सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

(लघुकथा) जंगल



उसकी माँ पुराने ज़माने की थी. जब भी परिवार का कोई, अस्पताल में भर्ती होता तो उसकी माँ अस्पताल पहुंचते ही आसपास के लोगों से बातचीत शुरू कर देती चाहे मरीज़ हों या उन्हें देखने वाले. वार्ड बॉय हो या नर्स, आगे बढ़-बढ़ के सबसे बात करती. डॉक्टर आते तो उन्हें भी एक बात पूछने पर चार  बताती. उसके बच्चों को यह सब पसंद नहीं था. एक दिन बेटे ने टोक दिया.
 
'बेटा जंगल में जब जानवर कहीं जाते हैं न, तो इकट्ठे चलते हैं. इकट्ठे चलने से उनमें हिम्मत बनी रहती है. यहां अस्पलातों में भी लोग अकेले ही होते हैं, उनका साथ देने से उनकी भी हिम्मत बढ़ती है. ये अस्पताल हमारे जंगल हैं.'- मां ने बेटे को समझाया.


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5 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ! एक फिल्म देखी थी मैंने नाम नहीं याद आ रहा है. उसमें हर्ट अटैक के बाद एक ही आई.सी.यू. में एक पत्रकार-संपादक और एक अंडरवर्ल्ड का खतरनाक डान भर्ती होते हैं और बाहर बैठी उन दोनों की पत्नियाँ पक्की सहली बन जाती हैं. दोनों मरीज भी होश आने के बाद एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं और इस सारे घटनाक्रम से प्रभावित होकर वो डान पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने का फैसला लेता है. अस्पताल बहुत अजीब जगह होती है...बहुत अजीब...यहाँ किसी को ज़िंदगी मिलती है तो किसी को मौत. लेकिन वहाँ मरीजों के साथ आये उनके करीबी और रिश्तेदार एक अनोखे रिश्ते से बंध जाते हैं.

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  2. बशर्ते कि इकट्ठा चलने से भगदड़ न मचे !

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