शनिवार, 24 दिसंबर 2011

(लघु कथा) ख़ुशफ़हमी


एक नेता जी थे और एक थी भीड़.
भीड़ नेता जी की कोठी पहुंची. नेताजी ऊपर वाले मकान की बालकनी में आए.
नेता जी को देख गुस्साई भीड़ ने पत्थर पकड़े हाथ ऊपर उठाए. नेता जी ने समझा लोग जय जयकार कर रहे हैं.
कुप्पाए नेता जी ने खुशी ख़ुशी स्वीकारोक्ति में हाथ जोड़े, भीड़ को लगा नेता जी ने हाथ जोड़ कर माफ़ी मांग ली है.
नेता जी वापिस अंदर चले गए. भीड़ के लोग भी तितर बितर हो अपने अपने घर हो लिए.
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