रविवार, 26 जुलाई 2015

(लघुकथा) समय




वह बचपन से ही माता पि‍ता के साथ शहर में रह कर पला बढ़ा. और फि‍र आगे की पढ़ाई करने के लि‍ए वह अमरीका चला गया था. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अब वहीं नौकरी कर रहा था और उसे ग्रीन कार्ड भी मि‍ल गया था. वह लंबे समय बाद भारत लौटा था और आजकल समय नि‍काल कर अपने पुश्तैनी गांव आया हुआ था. गांव आकर उसे लगा कि‍ समय जैसे ठहर सा गया है. सब कुछ लगभग वैसा ही लग रहा था जैसा वह बचपन में देखा करता था. 

आज वह अपने अनुभव सुनाता हुआ दादा के साथ खेतों की ओर जा रहा था, कि‍ वह वहां कैसे-कैसे पढ़ा, कैसे रहा, कैसे वह अब एक बहुत बड़े दफ़्तर में वहां के लोगों के साथ काम करता है. उसके दादा बड़े ध्यान से सुनते चल रहे थे. वह बता रहा था कि‍ वहां की एक बात जो उसे सबसे अच्‍छी लगी, वह थी वहां अनजान लोगों का भी एक दूसरे को देख कर मुस्‍कुराना और हाय-हैलो करके करते हुए नि‍कलना. तभी कंधे पर झोला टांगे सामने से आते हुए एक अधेड़ आदमी ने पास आने पर कहा –‘दद्दा राम राम.’ जवाब में उसके दादा ने भी राम-राम कही और दोनों आगे नि‍कल गए. उसने पूछा कि‍ दादा जी यह कौन था. दादा ने कहा –‘पता नहीं बेटा. कोई राहगीर होगा. खैर, तुम क्‍या कह रहे थे...‘    

उसने कुछ नहीं कहा और दादा के साथ-साथ चलने लगा.
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