गुरुवार, 21 अगस्त 2014

(लघुकथा ) न्याय



जहांगीर ने कि‍ले के दरवाज़े पर एक घंटा टंगवा दि‍या था. जि‍स कि‍सी को फ़रि‍याद करनी हो तो वह घंटा बजा सकता था. एक दि‍न, एक ग़रीब आदमी घंटा बजाने पहुंचा तो उसे वकील ने रोक लि‍या –‘तुम्‍हें न अरबी आती है न फ़ारसी, सुल्‍तान से अपनी बात कहोगे कैसे.’ ग़रीब उसके पीछे हो लि‍या -‘ठीक है माई-बाप, तो आप ही मेरा मामला ठीक करवा दो.’

वो दि‍न है और आज का दि‍न, वकील तारीख़ पे तारीख़ दे रहा है, प्रोसीज़र पूरा ही नहीं हो पा रहा है कि‍ वो घंटा बजा सके. ग़रीब आदमी का सब कुछ अब वकील के पास है सि‍वाय उसकी लंगोटी के. वकील की नज़र अब उसकी लंगोटी पर भी है. लेकि‍न ग़रीब को भरोसा पूरा है कि‍ एक न एक दि‍न वो घंटा जरूर बजा पाएगा.

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बुधवार, 16 जुलाई 2014

(लघुकथा ) समय.



वे दोनों साथ-साथ खेले, पढ़े और बड़े हुए. दोनों बहुत अच्‍छे दोस्‍त थे. जवानी में एक समय वह भी आया जब उन्‍हें दुनि‍या के दुख-दर्द दि‍खाई देने लगे. उन्‍होंने वि‍भि‍न्‍न वि‍चारक पढ़े, क्रांति‍यों और उनके क्रांति‍वीरों की गाथाएं पढ़ीं. मार्क्स की बातें उन्‍हें बहुत भायीं. समय बीतता चला गया. दोनों अपनी-अपनी अलग दुनि‍या में व्‍यस्‍त हो गए.  

लंबे समय बाद, दोनों एक बार फि‍र मि‍ले. एक मि‍त्र दुनि‍यादार हो गया था, उसने समय के साथ ताल मि‍लाते हुए मुस्‍कुराना भी सीख लि‍या था. दूसरे की बात करने का सलीका धीमा था पर बीच-बीच में खौलने की सी बानगी भी देता था. यूं तो दोनों ने खूब बातें कीं पर अब, पता नहीं उनके बीच कोई दीवार सी थी जो नहीं ही गि‍री.

दोनों ने अपनी-अपनी दुनि‍या में लौटने से पहले देखा कि‍ एक फ़र्क़ और था, एक के पांव में अभी भी चप्‍पल थी, दूसरे के पॉंव में अब जूते थे. 

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रविवार, 6 जुलाई 2014

(लघुकथा) डर



उस गांव के बीचोबीच से होकर एक सड़क नि‍कलती थी. सड़क के इधर हिन्‍दू रहते थे, सड़क के उस पार मुस्‍लि‍म रहते थे. दोनों तरफ, मुसलामानों के बीच कुछ-कुछ हि‍न्‍दू और, हिन्‍दुओं के बीच कुछ-कुछ मुसलमान भी रहते थे. उस गांव में न मस्‍जि‍द थी न मंदि‍र और धर्म को लेकर, दोनों में कभी कोई ऊंच-नीच भी सुनी नहीं गई. गांव के सभी लोग ग़रीब थे.

धीरे-धीरे उस गांव में भी तरक़्की पहुंची. लोगों को चार पैसे का आसरा होने लगा. हिन्‍दुओं को लगा कि‍ चलो एक मंदि‍र बनाया जाए, मुसलामानों को भी लगा कि‍ गांव में एक मस्‍जि‍द तो होनी ही चाहि‍ए. पर दोनों को लगता कि‍ कहीं इसे भड़काने वाली बात तो न माना जाएगा ! आख़ि‍र फ़ैसला हुआ कि‍ हिन्‍दुओं वाली तरफ का मंदि‍र उसी तरफ के मुसलमान बनाएंगे और, मुसलमानों की तरफ एक मस्‍जि‍द उसी तरफ वाले हि‍न्‍दू बानएंगे. यह भी तय रहा कि‍ बनाने वाले ही उनका रख-रखाव भी करेंगे. 

तरक़्की तो उन्‍होंने यूं भुगत ली. पर अब मंदिर और मस्‍जि‍द के कंगूरों पर गि‍द्ध बैठने लगे हैं.
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बुधवार, 25 जून 2014

(लघुकथा ) बड़े लोग



मेरे पड़ोसी का बेटा बचपन से ही बड़ा आदमी बनने के ख़्वाब देखा करता था. उसकी चाह पूरी होती भी दि‍खने लगी जब पढ़ाई-लि‍खाई में उसकी कोई रूचि‍ न रही, लेकि‍न बातों का पहलवान नि‍कला. और आख़ि‍र वो एक दि‍न भी आ ही गया जब ‘सीधे बारहवीं करें’ टाइप एक कॉलेज से उसके लि‍ए  स्‍नातक की डि‍ग्री जुटा ली गई. पि‍ता ने एक वकील दोस्‍त की नि‍गेहबानी में समाजसेवा के लि‍ए उसे एक एन. जी. ओ. खुलवा दी. बाक़ायदा बोर्ड लगाया गया. ख़र्चे की स्कीम बना ली गई. हर तरह के रजि‍स्‍टर और वाउचर भी तैयार कर लि‍ए, बस पैसे आने का ही मसला कुछ बन नहीं रहा था.

पर उस शाम, उनके घर जश्‍न का सा माहौल था. बाक़ायदा कुछ सेलि‍ब्रेशन सा चल रहा था. घर में कई लोग आए हुए थे. हल्के संगीत पर खाना-पीना हो रहा था. बीच-बीच में, ठहाकों की भी आवाज़ बाहर तक आ रही थी. घर के बाहर कई गाड़ि‍यां पार्क थीं. 

मैंने घर में घुसते हुए पत्‍नी से पूछा –‘तो इनके बेटे का रि‍श्‍ता हो गया क्‍या ? लड़की वाले कौन लोग हैं जी ?’

‘नहीं जी. उसकी मां बता रही थी कि‍ एन. जी. ओ. के लि‍ए ग्रांट मि‍लने की बात आज फ़ायनल हो गई है.’ – कहते हुए पत्‍नी रसोई में चली गई.
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