सोमवार, 28 नवंबर 2011

(लघु कथा) सांस्कृतिक संध्या

क-   "भइये समझ नहीं आया कि तुम क्या सोच कर सांस्कृतिक संध्या का आयोजन कर रहे हो. तुम्हारा, दुकानदारी के अलावा कल्चर-वल्चर से क्या संबंध रहा है !"

ख-   "...इसी बहाने बड़े-बूढ़े कुछ राजनीति कर लेंगे, लौंडे-लपाड़ों का आंख-मुटक्का हो जाएगा. अपन भी अगले इलेक्शन में चंदा देने से बचने के लिए टिकट मांगने वालों की फ़ेहरिस्त में शामिल हो लेंगे..."

क और ख -   "हें हें हें"
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