मंगलवार, 29 नवंबर 2011

(लघु कथा) विकास योजना

आने वाले चुनावों के लिए पार्टी प्रत्याशियों की सूचि जारी होनी थी. सर्किट हाउस के बाहर, टिकटों के अभिलाषी अपने-अपने समर्थकों के साथ पूरा लाव-लश्कर लिए जमा थे, भले ही टिकट ग़िनती की ही होती हों. बाज़ार गर्म था कि इस बार चुनाव प्रत्याशियों के नाम घोषित होते ही बाहर घल्लू-घारा की सी स्थति हो जाएगी, जिन्हें टिकट नहीं मिलेंगी वे ग़जब की तोड़-फोड़ करेंगे.  कुछ भी हो सकता है.

अंदर सलाह हुई. रणनीति बनी. टिकट की उम्मीद लगाए बैठे सभी पार्टी वर्करों को राज्यप्रभारी ने अकेले में बुला कर समझाया -" आप लोगों के लिए गांवों में ही अब इतनी स्कीमें चला दी हैं हमने कि असेंबली के चुनावों में वो बात नहीं रही. गांवों की पंचायतों में रहो  और इन स्कीमों को ठीक से चलाओ. समझ रहे हो न मैं क्या कह रहा हूं ?"

बात सबके समझ आ गई और वे अपने-अपने समर्थकों को लेकर खुशी-खुशी लौट गए.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी नजाने कितनी विकास योजनाये हर साल बना करती हैं। और हर साल सभी को यही कह कर की गाँव की पंचायत में ही रहो और इस स्कीमों को ठीक से चलाओ...टरका दिया जाता है॥ बढ़िया पोस्ट
    समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है ..

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  2. बहुत ही मनभावन प्रस्तुति । कामना है सर्वदा सृजनरत रहें । मेरे नए पोस्ट पर आपकी आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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  3. "अब असेंबली चुनाव में वो बात नहीं रही" मतलब साफ़ है कि पंचायतों में भ्रूष्टाचार के अनगिनत अवसर हैं। अन्ना और बाबा रामदेव को अभी बहुत दूर तक चलना है।

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